
देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफी अलग है। जिस समाज और परिवार को महिलाओं का सबसे बड़ा सहारा माना जाता है, वहीं उनकी असुरक्षा का सबसे बड़ा कारण भी बन जाता है।
घर के अंदर भी असुरक्षित महिलाएं
ऐसा माना जाता है कि घर की चारदीवारी महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित स्थान है, लेकिन अध्ययन और रिपोर्ट्स बताती हैं कि घरेलू हिंसा, मानसिक उत्पीड़न और लैंगिक भेदभाव की सबसे ज्यादा घटनाएं घर के भीतर ही होती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक, महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में सबसे ज्यादा मामले घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न से जुड़े होते हैं।
भरोसे के रिश्तों में दरार
घरेलू हिंसा: शादीशुदा महिलाओं को अपने ही घर में हिंसा का सामना करना पड़ता है।
दहेज उत्पीड़न: आज भी कई महिलाओं को दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता है।
यौन उत्पीड़न: सबसे ज्यादा मामले किसी जान-पहचान वाले या करीबी रिश्तेदार के खिलाफ दर्ज होते हैं।
भावनात्मक शोषण: महिलाओं को अपने सपने और करियर के साथ समझौता करने के लिए मजबूर किया जाता है।
कब बदलेगी यह तस्वीर?
कानून तो हैं, लेकिन जागरूकता की कमी है।
महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना जरूरी है।
परिवार और समाज को अपनी सोच बदलनी होगी।
अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
अब वक्त आ गया है बदलाव का!
महिला सुरक्षा सिर्फ एक कानून या नीति का विषय नहीं है, बल्कि यह हमारी मानसिकता से जुड़ा हुआ मुद्दा है। जब तक महिलाओं को उनके ही घर और समाज में सम्मान और सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक ‘सशक्तिकरण’ महज एक शब्द बना रहेगा।





