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कहीं 181 फीट का रावण, कहीं 30 फीट का कॉकरोच: देशभर में दशहरे की अनोखी तैयारियां
jantaserishta.com
20 Oct 2026 1:40 PM IST

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200 साल से पुरानी मानी जाती है रावण दहन की परंपरा.
नई दिल्ली: देशभर में 20 अक्टूबर को विजयादशमी का त्योहार मनाया जा रहा है। इस मौके पर कई शहरों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाएंगे। इस बार भी अलग-अलग शहरों में विशाल पुतले तैयार किए गए हैं। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में 181 फीट ऊंचा रावण बनाया गया है, जिसे देश के सबसे ऊंचे पुतलों में शामिल बताया जा रहा है।
पंजाब के लुधियाना में दरेसी ग्राउंड पर 121 फीट ऊंचे रावण का दहन होगा। कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के शामिल होने का कार्यक्रम है। वहीं, दिल्ली में पारंपरिक पुतलों के साथ 30 फीट ऊंचे कॉकरोच का पुतला जलाने की भी तैयारी की गई है। देश के अलग-अलग हिस्सों में दशहरा अपनी स्थानीय परंपराओं और खास आयोजनों के साथ मनाया जा रहा है।
इंदौर, भोपाल और कोटा में भी विशाल पुतले
मध्य प्रदेश के इंदौर में 111 फीट ऊंचे रावण का दहन किया जाएगा। यहां 250 फीट लंबी लंका तैयार की गई है और करीब डेढ़ घंटे तक आतिशबाजी का कार्यक्रम रखा गया है। भोपाल के कोलार क्षेत्र में 105 फीट तथा उज्जैन में 101 फीट ऊंचे रावण के पुतले जलाए जाएंगे। भोपाल में पुतले बनाने पर लगभग 20 लाख रुपये खर्च होने की जानकारी दी गई है।
राजस्थान के कोटा में भी 105 फीट ऊंचा रावण तैयार किया गया है। इसका वजन करीब पांच हजार किलोग्राम बताया गया है। यहां कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले भी बनाए गए हैं, जिनकी ऊंचाई 70-70 फीट है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के WRS मैदान में 101 फीट ऊंचे रावण का दहन होगा।
उत्तर प्रदेश में लखनऊ में 75 फीट ऊंचे रावण का पुतला जलाया जाएगा। बिहार की राजधानी पटना के गांधी मैदान में रावण का पुतला 90 फीट, मेघनाद का 85 फीट और कुंभकर्ण का 80 फीट ऊंचा बनाया गया है। झारखंड की राजधानी रांची के मोराबादी मैदान में 80 फीट ऊंचे रावण के साथ दो मंजिला लंका भी तैयार की गई है।
दिल्ली के पीतमपुरा में ....
दिल्ली के पीतमपुरा में श्री केशव रामलीला कमेटी ने इस बार दशहरा आयोजन में एक अलग प्रतीक शामिल किया है। यहां रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के अलावा 30 फीट ऊंचे कॉकरोच का पुतला भी जलाया जाएगा।
कमेटी के अध्यक्ष अशोक गोयल देवराहा के अनुसार, ऐसे प्रतीकों के जरिए सामाजिक समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की जाती है। कॉकरोच का पुतला तैयार करने वाले कारीगर शाहवेज खान ने बताया कि इसे बनाने में तीन से चार दिन लगे।
मध्य प्रदेश के मंदसौर में भी रावण का पुतला आकर्षण का केंद्र रहेगा। यहां बनाए गए पुतले की आंखें झपकेंगी, गर्दन घूमेगी और तलवार वाला हाथ भी हिलेगा। रायपुर में पुतले बनाने वाले कारीगरों के मुताबिक, बांस, रंगीन कागज, कपड़े और सजावट की दूसरी सामग्री महंगी होने से इस साल निर्माण लागत में लगभग 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है।
200 साल से पुरानी मानी जाती है रावण दहन की परंपरा
दशहरे पर रावण दहन की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। मान्यता है कि 17वीं शताब्दी में तुलसीदास के शिष्य मेघा भगत ने वाराणसी में रामलीला की शुरुआत की थी। हालांकि, रामलीला और रावण दहन के आयोजन का एक ऐतिहासिक दृश्य 1834 में ब्रिटिश कलाकार जेम्स प्रिन्सेप की बनाई पेंटिंग में दिखाई देता है।
इस चित्र में रामनगर में बनारस के राजा के सामने रामलीला का आयोजन दर्शाया गया है। यह पेंटिंग लंदन की ब्रिटिश लाइब्रेरी में मौजूद बताई जाती है। हालांकि, किसी एक चित्र के आधार पर पूरे देश में इस परंपरा की शुरुआत की निश्चित तारीख तय नहीं की जा सकती।
हर जगह नहीं जलाया जाता रावण का पुतला
भारत में दशहरा मनाने के तरीके भी अलग-अलग हैं। मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के रावण नाम वाले एक गांव में स्थानीय मान्यता के अनुसार रावण को ग्राम देवता के रूप में पूजा जाता है। यहां दशहरे पर पुतला जलाने के बजाय पूजा, आरती, रामायण पाठ और सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है।
कर्नाटक के मैसूर में दशहरा देवी चामुंडेश्वरी की महिषासुर पर विजय के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। यहां की प्रसिद्ध जंबू सवारी में सजे हाथियों, पारंपरिक झांकियों और लोककलाओं की प्रस्तुति होती है।
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी दशहरा अलग अंदाज में मनाया जाता है। यहां सात दिनों तक चलने वाले उत्सव में विभिन्न गांवों के देवी-देवताओं के रथ और पालकियां पहुंचती हैं। अंतिम दिन ब्यास नदी के किनारे प्रतीकात्मक लंका दहन किया जाता है। इस तरह विजयादशमी का पर्व देश के अलग-अलग हिस्सों में विविध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के साथ मनाया जाता है।
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