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फिराक गोरखपुरी: भगवद गीता से प्रेरित 'नगम-ए-हकीकत', शायरी में झलकी दर्द-मोहब्बत और दर्शन

jantaserishta.com
3 March 2026 8:08 AM IST
फिराक गोरखपुरी: भगवद गीता से प्रेरित नगम-ए-हकीकत, शायरी में झलकी दर्द-मोहब्बत और दर्शन
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नई दिल्ली: मुंहफट मिजाज, शायरी और विरोधाभासी व्यक्तित्व के लिए मशहूर रघुपति सहाय, उर्फ फिराक गोरखपुरी, उर्दू के महान शायर थे। उनकी शायरी में दर्द और मोहब्बत के साथ जिंदगी का दर्शन भी झलकता था। वह सिविल सेवा छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए और उर्दू शायरी को नई दिशा दी। उनकी शायरी आज भी उतनी ही प्रासंगिक और दिल को छूने वाली है।
28 अगस्त 1896 को गोरखपुर में जन्मे गोरखपुरी का इंतकाल 3 मार्च 1982 को दिल्ली में हुआ था। एक इंटरव्यू में उन्होंने अपनी जिंदगी और शायरी के सफर के बारे में विस्तार से बताया था।
फिराक ने एक इंटरव्यू में बताया था कि 1918-1919 से उन्होंने शेरों-शायरी का सफर शुरू किया। 1918 से 1930 तक का दौर उनका पहला दौर था। इस दौरान उन्होंने लगभग 100 से ज्यादा गजलें, 60-70 रुबाइयां और कई नज्में लिखीं। उस समय उर्दू शायरी में नई जान फूंकने का दौर था- सच्चाई, जज्बात, मोहब्बत, वतनप्रेम, नैतिकता और प्रकृति के चित्रण की तलाश थी। ऐसे में उनकी शायरी में धीरे-धीरे एक नया दर्द और कसक उभरने लगी, जो उनकी आवाज बन गई।
फिराक गोरखपुरी ने सिर्फ शायरी में ही नाम नहीं कमाया, बल्कि भारत की आजादी की लड़ाई में भी सक्रिय योगदान दिया। वह 'सविनय अवज्ञा आंदोलन' में शामिल हुए। 1920 के दशक में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें राजनीतिक कैदी बनाकर जेल भी भेजा। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने ब्रिटिश सरकार की सिविल सर्विस की नौकरी छोड़ दी। जवाहरलाल नेहरू के बुलावे पर वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में अवर सचिव के पद पर भी काम कर चुके हैं।
15 महीने तक वह आगरा जेल में सियासी कैदी रहे। जेल में कई मुशायरे हुए। एक मुशायरे में उन्होंने शेर पढ़ा था “अहल-ए-जिंदा की यह महफिल है सबूत इसका फिराक कि बिखर कर भी ये राजा परेशान न हुआ।”
फिराक की जिंदगी में शायरी, स्वतंत्रता संग्राम और शिक्षा तीनों का सुंदर मेल देखने को मिलता है। वे एक तरफ गहरे जज्बातों वाली शायरी करते थे, तो दूसरी तरफ देश की आजादी के लिए संघर्ष भी किया। उनकी यह बहुमुखी व्यक्तित्व आज भी लोगों को प्रेरित करती है।
साल 1918 में वह एक ऐसी हस्ती से इश्क में पड़ गए, जिससे मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी। इस मोहब्बत ने उन्हें 12-13 साल तक बेचैन रखा। उन्होंने कहा कि उन्होंने इश्क को कभी सतही नहीं रखा। शारीरिक आकर्षण को मानते हुए भी उन्होंने आंतरिक आंच से ख्वाहिशों को पुख्ता बनाया। उनके इश्किया शेरों में तन्हाई, इंतजार और जुदाई का गहरा एहसास है।
उन्होंने बताया था, "मैंने अपने इशकिया अशार को छिछलेपन और छिछोरेपन का शिकार नहीं होने दिया। मैं मोहब्बत और तल्लुज-ए-जिस्मानी का जरूर कायल हूं। लेकिन इस हकीकत का भी कायल हूं कि एक दाखिली आंच से ख्वाहिशात-ए-नफ्सानी को कमजोर बनाए बगैर उन्हें पुख्ता बनाया जा सकता है।"
परिवार को लेकर मिले दर्द भी उनकी शायरी में झलके। 1918 में पिता मुंशी गोरख प्रसाद इबरत का देहरादून में निधन हुआ। जेल में रहते हुए छोटे भाई की मौत हो गई। बड़े भाई की मौत भी जवानी में हुई। इन दुखों को उन्होंने मार्मिक शेरों और नज्मों में बयान किया। पिता के निधन पर लिखी नज्म में सुबह की खूबसूरती और दर्द का मेल है। भाई की मौत पर लिखी लंबी नज्म में दर्द की गहराई साफ दिखती है।
भगवद गीता से बहुत प्रभावित होकर गोरखपुरी ने “नगम-ए-हकीकत” नाम की नज्म लिखी। इसमें कृष्ण अर्जुन को जो उपदेश देते हैं, उसे उन्होंने उर्दू में खूबसूरती से व्यक्त किया। नज्म के कुछ बंदों में वह कहते हैं, "सारी सृष्टि, नेकी-बदी, दुख-सुख सब उनके नूर की किरणें हैं। वे खुद सब कुछ हैं पांडवों का सब्र, जंग-ए-बदर में शहीदों की जांबाजी, राम का सहरा, करबला की नींद। पूरी हस्ती उनके दम से कायम है।"
साल 1924 में वह इलाहाबाद में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी सेक्रेटरी थे। एक रात तन्हाई में उन्हें वतनप्रेम से भरी गजल सूझी। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन में शामिल होने का जज्बा उनकी कई गजलों में झलकता है।
फिराक गोरखपुरी को उनके उम्दा साहित्यिक योगदान के लिए कई बड़े और प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। साल 1960 में उन्हें उर्दू साहित्य के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया। किताब ‘गुल-ए-नगमा’ के लिए उन्हें देश का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके अलावा और भी कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
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