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Hyderabad हैदराबाद। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के हैदराबाद जोनल कार्यालय ने आंध्र प्रदेश के चर्चित शराब घोटाले की जांच में बड़ी कार्रवाई करते हुए 441.63 करोड़ रुपए की चल और अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से अटैच कर लिया है। यह कार्रवाई धन शोधन मामले, 2002 के तहत की गई है। जिन लोगों और संस्थाओं की संपत्तियां अटैच की गई हैं उनमें केसिरेड्डी राजशेखर रेड्डी, उनके परिवार के सदस्य और उनसे जुड़ी कंपनियां, बूनेटी चाणक्य और उनकी संबंधित संस्थाएं, और डोंथिरेड्डी वासुदेव रेड्डी के रिश्तेदार और उनसे जुड़ी संस्थाएं शामिल हैं। अटैच की गई संपत्तियों में बैंक बैलेंस, फिक्स्ड डिपॉजिट, जमीन के प्लॉट और अन्य अचल संपत्तियां शामिल हैं।
इस मामले में जांच की शुरुआत आंध्र प्रदेश सरकार के प्रिंसिपल सेक्रेटरी की शिकायत के आधार पर हुई थी। शिकायत के बाद क्राइम इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट आंध्र प्रदेश (सीआईडी) ने भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की थी। जांच में आरोप लगाया गया कि शराब व्यापार से जुड़े एक बड़े घोटाले के कारण राज्य के सरकारी खजाने को लगभग 4000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। ईडी ने इसी एफआईआर के आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग के एंगल से जांच शुरू की।
जांच में सामने आया कि 2019 से पहले आंध्र प्रदेश में शराब के व्यापार को एक पारदर्शी और ऑटोमेटेड सॉफ्टवेयर सिस्टम के जरिए नियंत्रित किया जाता था। इस सिस्टम के माध्यम से शराब की खरीद, सप्लाई, और बिक्री की पूरी प्रक्रिया डिजिटल रूप से ट्रैक होती थी, जिससे हर लेन-देन का स्पष्ट इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड मौजूद रहता था। लेकिन 2019 के विधानसभा चुनावों के बाद नई सरकार बनने के बाद शराब की रिटेल बिक्री पर सरकार ने एक तरह से पूरा नियंत्रण स्थापित कर लिया और यह काम आंध्र प्रदेश राज्य पेय पदार्थ निगम लिमिटेड के जरिए संचालित सरकारी रिटेल आउटलेट्स से किया जाने लगा।
ईडी की जांच के मुताबिक इसके बाद एक आपराधिक साजिश के तहत पुराने ऑटोमेटेड सिस्टम को बंद कर दिया गया और उसकी जगह मैनुअल सिस्टम लागू कर दिया गया। इस बदलाव के बाद एपीएसबीसीएल के अधिकारियों को शराब सप्लाई के ऑर्डर जारी करने में लगभग पूरी छूट मिल गई। जांच में यह भी पाया गया कि इस मैनुअल सिस्टम का इस्तेमाल स्थापित शराब ब्रांड्स के साथ भेदभाव करने के लिए किया गया। कई पुराने और लोकप्रिय ब्रांड्स को जानबूझकर कम ऑर्डर दिए गए या बाजार से लगभग बाहर कर दिया गया, जबकि कुछ चुनिंदा 'पसंदीदा' ब्रांड्स को रिश्वत के बदले विशेष लाभ और ज्यादा सप्लाई ऑर्डर दिए गए।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि शराब सिंडिकेट ने 'एक जैसे दिखने वाले ब्रांड' बाजार में उतारने को बढ़ावा दिया। इन ब्रांड्स की बेसिक कीमतों को कृत्रिम रूप से बढ़ाकर तय किया जाता था, जिससे डिस्टिलरी कंपनियों को अतिरिक्त मुनाफा होता था। इसी अतिरिक्त रकम का इस्तेमाल कथित तौर पर रिश्वत देने के लिए किया जाता था। ईडी के अनुसार डिस्टिलरी कंपनियों को सप्लाई ऑर्डर पाने के लिए हर केस की बेसिक कीमत का लगभग 15 से 20 प्रतिशत तक अवैध किकबैक देने के लिए मजबूर किया जाता था।
जांच में यह भी सामने आया कि जिन निर्माताओं ने यह रिश्वत देने से इनकार किया, उन्हें कई तरह के दबावों का सामना करना पड़ा। इसमें सप्लाई ऑर्डर रद्द करना और उनके भुगतान रोकना जैसी कार्रवाइयां शामिल थीं। रिश्वत से जुड़ी बातचीत को छिपाने के लिए कथित तौर पर एन्क्रिप्टेड इंटरनेट कॉल और सुरक्षित मैसेजिंग एप्लिकेशन का इस्तेमाल किया गया, ताकि मुख्य लोगों की पहचान और भूमिका गुप्त रखी जा सके। ईडी के मुताबिक, केसिरेड्डी राजशेखर रेड्डी ने अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर शराब खरीद और वितरण प्रणाली में बड़े पैमाने पर हेरफेर किया। जांच एजेंसी का दावा है कि इस पूरी प्रक्रिया से सरकारी खजाने को लगभग 3500 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। इसी दौरान कथित तौर पर लगभग 3500 करोड़ रुपए की रिश्वत भी ली गई, जिसे बाद में अलग-अलग तरीकों से बांटकर निजी लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया।
जांच में यह भी पता चला कि कुछ डिस्टिलरी कंपनियों को सीधे या परोक्ष रूप से सिंडिकेट के नियंत्रण में लाया गया। इनमें अदन डिस्टिलरी प्राइवेट लिमिटेड, लीला डिस्टिलरीज प्राइवेट लिमिटेड और यू.वी. डिस्टिलरी जैसी कंपनियां शामिल बताई जा रही हैं। इन कंपनियों को कथित रूप से राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव का इस्तेमाल करके ज्यादा व्यापारिक लाभ दिलाया गया। इसके अलावा ईडी की जांच में यह भी सामने आया कि शराब के परिवहन से जुड़े ठेकों में भी हेरफेर किया गया। जांच एजेंसी के अनुसार एपीएसबीसीएल ने एक केंद्रीकृत ट्रांसपोर्टेशन टेंडर सिग्मा सप्लाई चेन सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड को दिया, जिसकी दरें पहले की तुलना में काफी ज्यादा थीं। हालांकि ठेका इस कंपनी के नाम पर था, लेकिन संचालन पर कथित रूप से शराब सिंडिकेट से जुड़े लोगों का नियंत्रण था।
जांच में यह भी पाया गया कि घोटाले से अर्जित धन को छिपाने के लिए कई शेल कंपनियों और फर्जी फर्मों का नेटवर्क बनाया गया। इन कंपनियों के माध्यम से पैसों को कई चरणों में ट्रांसफर करके उनकी असली उत्पत्ति को छिपाने की कोशिश की गई। साथ ही इन पैसों का इस्तेमाल रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स और निजी संपत्तियां खरीदने में भी किया गया। ईडी के अनुसार अब तक जांच में लगभग 1048.45 करोड़ रुपए के मनी ट्रेल का पता लगाया जा चुका है। एजेंसी का कहना है कि इस मामले में आगे भी जांच जारी है और आने वाले समय में और कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
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