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भगवान रघुनाथ से प्रीत, राजपरिवार आज भी निभा रहा सदियों पुरानी रीत
Shantanu Roy
21 Oct 2026 1:40 PM IST

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कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा की पहचान केवल सैकड़ों देवी-देवताओं के महाकुंभ तक सीमित नहीं है। इस उत्सव की आत्मा में भगवान रघुनाथ के प्रति समर्पण और कुल्लू के राजपरिवार की सदियों पुरानी सेवा परंपरा भी रची-बसी है। पीढ़ी दर पीढ़ी भगवान रघुनाथ को दिए वचन का निर्वहन करता आ रहा राजघराना आज भी इस ऐतिहासिक उत्सव में मुख्य सेवक की भूमिका निभा रहा है। कुल्लू के राजा जगत सिंह के शासनकाल में भगवान रघुनाथ की प्रतिमा अयोध्या से कुल्लू लाई गई थी। मान्यताओं के अनुसार राजा ने भगवान रघुनाथ को अपना राजपाट समर्पित कर दिया और स्वयं उनका सेवक बनकर जीवन बिताने का संकल्प लिया। यही समर्पण कुल्लू दशहरा की परंपरा का आधार बना। भगवान रघुनाथ को कुल्लू का अधिष्ठाता देवता माना जाता है। राजपरिवार का मुखिया उनके मुख्य छड़ीबरदार के रूप में सेवा करता है। वर्तमान में महेश्वर सिंह यह जिम्मेदारी निभा रहे हैं। भगवान रघुनाथ के ढालपुर पहुंचने, पूजा-अर्चना और विभिन्न पारंपरिक अनुष्ठानों में राजपरिवार की प्रमुख भूमिका रहती है। उत्सव के सात दिनों के दौरान राजपरिवार ढालपुर में बने अस्थायी शिविर में रहता है, जिसे ‘राजा की चानणी’ कहा जाता है। देवताओं के स्वागत, पूजा और अनुष्ठानों में निर्धारित परंपराओं का विशेष ध्यान रखा जाता है। उत्सव के दौरान निकलने वाली जलेब में भी राजपरिवार की भूमिका रहती है।
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