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ISI मॉड्यूल के सवालों बचते नज़र आए CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके

Shantanu Roy
5 Aug 2026 7:55 PM IST
ISI मॉड्यूल के सवालों बचते नज़र आए CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके
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Punjab. पंजाब। देश की राजनीति में बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप के माहौल पर कटाक्ष करते हुए एक काल्पनिक व्यंग्यात्मक संवाद इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। इस व्यंग्य में "कॉकरोच जनता पार्टी" के काल्पनिक संस्थापक अभिजीत दीपके और एक पत्रकार के बीच हुई बातचीत को दर्शाया गया है, जिसमें गंभीर सवालों के जवाब लगातार बदलते नजर आते हैं।
व्यंग्य के अनुसार, बातचीत की शुरुआत पत्रकार द्वारा कथित तौर पर दो आतंकी मॉड्यूल के भंडाफोड़ से जुड़े सवाल से होती है। पत्रकार पूछता है कि पुलिस ने ISI समर्थित दो मॉड्यूल का खुलासा किया है, इस पर उनकी क्या प्रतिक्रिया है। इसके जवाब में काल्पनिक पात्र अभिजीत दीपके बिना किसी तथ्य या विवरण का उल्लेख किए पूरे मामले को "फेक न्यूज़" बताते हुए दावा करते हैं कि यह असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश है।
संवाद आगे बढ़ता है तो पत्रकार दूसरा सवाल करता है कि कथित तौर पर इन मॉड्यूल का निशाना जंतर-मंतर पर चल रहा प्रदर्शन था और पेट्रोल बम से हमला करने की तैयारी की बात सामने आई है। व्यंग्य में दीपके का पात्र फिर उसी अंदाज में पूरे मामले को खारिज कर देता है और इसे मीडिया तथा राजनीतिक साजिश करार देता है। इसके बाद पत्रकार बातचीत में एक नया मोड़ लाते हुए कहता है कि कार्रवाई किसी केंद्रीय एजेंसी ने नहीं, बल्कि पंजाब पुलिस ने की है और राज्य में तो एक अलग राजनीतिक दल की सरकार है। इस सवाल के बाद व्यंग्य का हास्य चरम पर पहुंचता है। काल्पनिक पात्र अचानक विषय बदलते हुए कहता है कि उसे "टाइफॉयड हो गया है" और अब उसे आराम करने दिया जाए।
व्यंग्य लेख में यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि कई बार सार्वजनिक बहस में कठिन सवालों के सीधे जवाब देने के बजाय विषय बदलने, आरोप लगाने या बातचीत समाप्त करने की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। लेखक ने इसी प्रवृत्ति पर हास्य के माध्यम से कटाक्ष करने का प्रयास किया है। राजनीतिक व्यंग्य लंबे समय से लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा रहा है। इसका उद्देश्य किसी वास्तविक घटना का प्रमाण प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि सार्वजनिक विमर्श, नेताओं की बयानबाजी और राजनीतिक संचार की शैली पर हास्यपूर्ण टिप्पणी करना होता है। ऐसे व्यंग्य पाठकों को मुस्कुराने के साथ-साथ यह सोचने का अवसर भी देते हैं कि सार्वजनिक जीवन में तथ्यों, जवाबदेही और संवाद का कितना महत्व है।
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