जज के खिलाफ कार्रवाई नहीं रोक सकते, सुप्रीम कोर्ट की सख्ती

दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि किसी जज के खिलाफ संवाददाता सम्मेलन आयोजित करने और सार्वजनिक रूप से आरोप लगाने को हल्के में नहीं लिया जा सकता। न्यायालय ने वकील नीलेश ओझा की उस याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने मुंबई हाई कोर्ट की ओर से उनके खिलाफ शुरू की गई अवमानना कार्यवाही को चुनौती दी थी। एचसी ने यह कार्यवाही दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियान की मौत के मामले में संवाददाता सम्मेलन के दौरान एक जज को निशाना बनाकर की गई ओझा की अपमानजनक और मानहानिकारक टिप्पणी को लेकर शुरू की थी।
जून 2020 में सुशांत का शव मुंबई के बांद्रा स्थित उनके फ्लैट में मिला था। सालियान के पिता ने अपनी बेटी की रहस्यमय मौत के मामले में नए सिरे से जांच की मांग करते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। 1 अप्रैल को सालियान के वकील ओझा ने संवाददाता सम्मेलन में उच्च न्यायालय के उस न्यायाधीश पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, जिनके समक्ष याचिका की सुनवाई होनी थी। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि न्यायिक कार्यवाही को बदनाम करने या सनसनीखेज बनाने का कोई भी प्रयास संस्था की नींव को कमजोर करता है। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें ओझा के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेते हुए अवमानना कार्यवाही शुरू की गई थी। पीठ ने कहा, 'इसलिए, हम इस समय कार्यवाही पर रोक लगाने को इच्छुक नहीं हैं। हम उच्च न्यायालय से अनुरोध करते हैं कि वह मामले को शीघ्रता से आगे बढ़ाए और इसमें उत्पन्न होने वाले सभी मुद्दों पर स्वतंत्र रूप से और उनके गुण-दोष के आधार पर निर्णय करे।' उच्चतम न्यायालय ने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता संवैधानिक व्यवस्था का एक मूलभूत और अपरिवर्तनीय पहलू है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता-अवमाननाकर्ता से, बार का सदस्य और न्यायालय का अधिकारी होने के नाते, कानून के पेशे की गरिमा व न्यायिक प्रक्रिया की संस्थागत पवित्रता के अनुरूप आचरण करने की अपेक्षा की जाती है। पीठ ने कहा, 'इस पृष्ठभूमि में अपीलकर्ता-अवमाननाकर्ता की ओर से संवाददाता सम्मेलन करना और एक मौजूदा न्यायाधीश के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आरोप लगाने को हल्के में नहीं लिया जा सकता। अदालत में लंबित विवाद को इस तरह सार्वजनिक करना जिससे कार्यवाही सनसनीखेज बन जाए या संस्था या उसके संवैधानिक घटक, अर्थात् न्यायाधीशों पर आक्षेप लगाया जाए, एक वकील से अपेक्षित अनुशासन के बिल्कुल विपरीत है।' पीठ ने कहा, 'जिस तरह से संवाददाता सम्मेलन किया गया और आरोप लगाए गए, वह प्रथम दृष्टया कानून के पेशे के सदस्य के लिए अशोभनीय है। साथ ही उचित व्यवहार, संयम, पेशेवर और नैतिक जिम्मेदारी के उन मानकों से कम है, जिनकी कानून के पेशे को अपेक्षा होती है।'





