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इस्लाम अपनाने के बाद पुराने सामाजिक दर्जे से आरक्षण का दावा नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट
jantaserishta.com
15 Oct 2026 12:55 PM IST

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदू धर्म छोड़कर किसी गैर-हिंदू धर्म को अपनाने वाला व्यक्ति केवल अपने पुराने सामाजिक दर्जे के आधार पर आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के एक आदेश से जुड़े मामले में मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। मामला समीर अहमद का था, जिन्होंने इस्लाम अपनाने के बाद मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का प्रमाणपत्र मांगा था। अदालत ने अनुसूचित जाति के दर्जे से जुड़े 1950 के संवैधानिक आदेश का भी उल्लेख किया।
धर्म परिवर्तन और आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण के दावे से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि हिंदू धर्म से किसी गैर-हिंदू धर्म में जाने वाला व्यक्ति केवल अपने पुराने सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण का लाभ नहीं मांग सकता।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत केवल पूर्व सामाजिक स्थिति के आधार पर आरक्षण या सकारात्मक कार्रवाई का लाभ पाने का दावा नहीं किया जा सकता।
यह मामला तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च 2024 के आदेश से जुड़ा था। इस आदेश में पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदाय और अनुसूचित जाति से जुड़े लोगों को इस्लाम अपनाने के बाद मुस्लिम पिछड़ा वर्ग में शामिल करने की अनुमति दी गई थी। मद्रास हाईकोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगाते हुए इसे असंवैधानिक बताया था। इसके बाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन शीर्ष अदालत ने उसे कायम रखा।
अनुसूचित जाति का दर्जा किन धर्मों में मान्य है?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 1950 के संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि इसके तहत अनुसूचित जाति का दर्जा हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म मानने वाले लोगों के लिए निर्धारित है। अन्य धर्मों को अपनाने वाले व्यक्तियों को इस व्यवस्था के तहत अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं मिल सकता।
कोर्ट के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद इस संवैधानिक व्यवस्था के दायरे से बाहर हो जाता है, तो वह अपने पुराने जातिगत दर्जे के आधार पर अनुसूचित जाति से जुड़े लाभों का दावा नहीं कर सकता।
इस मामले में अदालत का मुख्य सवाल यह था कि क्या धर्म बदलने के बाद कोई व्यक्ति अपने पहले के सामाजिक दर्जे के आधार पर आरक्षण पाने का अधिकार बनाए रख सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया।
क्या है समीर अहमद से जुड़ा पूरा मामला?
यह विवाद सेक्रेटरी टू गवर्नमेंट बनाम समीर अहमद एन मामले से जुड़ा है। समीर अहमद का पहले नाम परमशिवम था। उनका जन्म तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले में एक हिंदू परिवार में हुआ था।
समीर अहमद ने 2015 में इस्लाम अपना लिया था। इसके बाद उन्होंने अपना नाम बदल लिया और इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार शादी की। बाद में उन्होंने मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए आवेदन किया।
मुस्लिम लेब्बाई तमिलनाडु सरकार के आदेश के तहत मुस्लिम पिछड़े वर्ग में मान्यता प्राप्त सात समुदायों में शामिल है। हालांकि, तहसीलदार ने समीर अहमद का आवेदन खारिज कर दिया।
इसके बाद उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनकी मांग थी कि अदालत यह स्वीकार करे कि धर्म परिवर्तन के बाद भी वह पिछड़े समुदाय से जुड़े हुए हैं और उन्हें उसी आधार पर मान्यता दी जाए।
मद्रास हाईकोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की?
मद्रास हाईकोर्ट ने समीर अहमद की याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने मार्च 2024 के तमिलनाडु सरकार के आदेश को भी असंवैधानिक बताया था। हाईकोर्ट के फैसले में कहा गया था कि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से इस्लाम अपना सकता है, लेकिन केवल आरक्षण का लाभ हासिल करने के लिए उसे इस्लाम के भीतर किसी जाति या समुदाय में धर्मांतरित मान्यता नहीं दी जा सकती। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। अब शीर्ष अदालत ने भी मद्रास हाईकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा है।
धर्म परिवर्तन का जाति प्रमाणपत्र पर क्या असर पड़ता है?
इस मामले से धर्म परिवर्तन और आरक्षण के बीच संबंध को लेकर कुछ अहम बातें सामने आती हैं।
- अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र: 1950 के संवैधानिक आदेश के तहत निर्धारित धर्मों से बाहर जाने पर अनुसूचित जाति का दर्जा प्रभावित होता है।
- पुरानी जाति के आधार पर दावा: अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल पहले की सामाजिक स्थिति का हवाला देकर आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता।
- पिछड़े वर्ग का प्रमाणपत्र: किसी अन्य समुदाय में शामिल होने के लिए संबंधित नियमों और पात्रता की शर्तें लागू होती हैं। केवल धर्म परिवर्तन से किसी खास समुदाय का प्रमाणपत्र अपने आप नहीं मिल जाता।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का केंद्र यही है कि आरक्षण का दावा संबंधित संवैधानिक प्रावधानों और लागू नियमों के अनुसार तय होगा, न कि केवल व्यक्ति की पहले की सामाजिक पहचान के आधार पर।
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