
पश्चिम बंगाल। मुर्शिदाबाद जिले में एक बूथ स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) की दिल का दौरा पड़ने से मौत होने के बाद राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े कार्यभार को इसका कारण बताया, जबकि भाजपा ने राज्य सरकार पर इस घटना को लेकर राजनीति करने का आरोप लगाया। माया मुखोपाध्याय (58) हरिहरपारा ब्लॉक के अंतर्गत श्रीपुर नामुपाड़ा शिशु शिक्षा केंद्र में प्राथमिक विद्यालय की शिक्षिका थीं और हाल में उन्हें एसआईआर कवायद के बीच बूथ नंबर 251 के लिए बीएलओ ड्यूटी पर तैनात किया गया था।
उनके परिवार के सदस्यों ने बताया कि बृहस्पतिवार रात को घर पर ही वह बेहोश हो गई और अस्पताल ले जाने के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। उनके परिवार ने आरोप लगाया कि बीएलओ की जिम्मेदारी सौंपे जाने के बाद मुखोपाध्याय गंभीर मानसिक तनाव में थीं और उन्हें डर था कि पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाये जाने पर ग्रामीणों की ओर से विरोध का सामना करना पड़ेगा। उनके छोटे बेटे रुबेल मंडल ने पत्रकारों से कहा, ''बीएलओ बनने के बाद मेरी मां मानसिक दबाव सहन नहीं कर पाईं। उनकी तबीयत खराब थी और कुछ समय पहले उन्हें मुर्शिदाबाद मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के आईसीयू में भी भर्ती कराया गया था।'' उन्होंने दावा किया कि उनके प्रभार वाले बूथ में लगभग 830 मतदाता थे और एसआईआर प्रक्रिया के तहत 320 से अधिक नोटिस जारी किए गए थे। मोंडल ने कहा, ''वह बार-बार कहती थी कि अगर नाम मिटा दिए गए तो गांव वाले आकर हमारे घर पर हमला कर सकते हैं। वह लगातार डर के साये में जीती थी।'' उनके परिवार के सदस्यों ने यह भी कहा कि मुखोपाध्याय को उम्र संबंधी बीमारियां थीं और वह बीएलओ के कर्तव्यों को निभाने के लिए अनिच्छुक थीं, लेकिन उनके पास प्रशासनिक आदेशों का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।
हरिहरपाड़ा के बीडीओ सेरिंग जाम भूटिया ने मौत की पुष्टि की और कहा कि प्रशासन मामले की जांच कर रहा है। उन्होंने कहा, ''उनकी मृत्यु हृदयाघात से हुई। हमें सूचित किया गया है कि वे अस्वस्थ थीं। विवरण जुटाने के लिए एक प्रतिनिधि को भेजा गया है।'' हरिहरपाड़ा से तृणमूल कांग्रेस के विधायक, नियामत शेख ने आरोप लगाया कि एसआईआर प्रक्रिया को जिस तरीके से लागू किया जा रहा है, उससे बीएलओ के बीच दहशत पैदा हो गई है। उन्होंने दावा किया, ''पहले तो वह ठीक थीं, लेकिन बीएलओ का काम मिलने के बाद से वह बहुत डरी हुई थीं। कई बीएलओ ने हमसे संपर्क करके बताया है कि वे दबाव सहन नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन नौकरी खोने के डर से काम जारी रखे हुए हैं।''





