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बिहार चुनाव 2025: 2020 में गोह सीट पर मिली पहली जीत को राजद रखेगा बरकरार या फिर भाजपा लेगी हार का बदला?

jantaserishta.com
30 Oct 2025 4:02 PM IST
बिहार चुनाव 2025: 2020 में गोह सीट पर मिली पहली जीत को राजद रखेगा बरकरार या फिर भाजपा लेगी हार का बदला?
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पटना: बिहार की चुनावी बिसात पर कुछ सीटें ऐसी होती हैं, जो अपने इतिहास से ज्यादा अपने वर्तमान के बड़े उलटफेर के लिए पहचानी जाती हैं। औरंगाबाद जिले की गोह विधानसभा सीट भी उन्हीं में से एक है। यह सीट दशकों तक कांग्रेस, वाम दलों और फिर जनता दल यूनाइटेड का गढ़ रही, लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में यहां ऐसा बड़ा बदलाव हुआ कि गोह का नाम बिहार की राजनीतिक सुर्खियों में आ गया।
पिछले चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के भीम सिंह ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दिग्गज मनोज कुमार शर्मा को भारी अंतर से हराया। यह जीत गोह के चुनावी इतिहास में राजद का पहला परचम था। गोह विधानसभा क्षेत्र की स्थापना 1951 में हुई थी और यह काराकाट लोकसभा क्षेत्र के छह विधानसभा क्षेत्रों में से एक है। 16 विधानसभा चुनावों का इतिहास बताता है कि यह सीट कभी किसी एक पार्टी के प्रभुत्व में नहीं रही।
शुरुआती दौर में कांग्रेस (4 बार) और सीपीआई (4 बार) ने सबसे अधिक जीत दर्ज की। बाद में सोशलिस्ट और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को भी एक-एक बार सफलता मिली। साल 2000 में समता पार्टी (जो बाद में जदयू बनी) ने जीत दर्ज की और फिर लगातार 3 बार यह सीट जीती।
2015 में यह सीट पहली बार भाजपा के खाते में गई, लेकिन 2020 का चुनाव एक नया अध्याय लेकर आया, जब राजद ने इस सीट पर पहली बार कब्जा जमाया। राजद उम्मीदवार भीम कुमार सिंह ने भाजपा प्रत्याशी मनोज कुमार शर्मा को शिकस्त दी थी। इस बार भी दोनों आमने सामने हैं।
यादव, मुस्लिम, राजपूत, भूमिहार और पासवान मतदाताओं की आबादी यहां अच्छी-खासी है। हालांकि यह सामान्य सीट है, फिर भी अनुसूचित जातियों की भागीदारी करीब 20.72 प्रतिशत है। मुस्लिम मतदाताओं का प्रतिशत भी लगभग 8.4 प्रतिशत है। 2020 के चुनाव में यहां 3,08,689 पंजीकृत मतदाता थे, जिनमें से 59.92 प्रतिशत ने मतदान किया था।
गोह की भूमि भले ही किसी महान स्वतंत्रता संग्राम के नायक के लिए सीधे तौर पर न जानी जाती हो, लेकिन इतिहास की आहटें यहां की मिट्टी में दबी हैं। दाउदनगर अनुमंडल के अंतर्गत आने वाले इस प्रखंड ने मौर्य और गुप्त जैसे शक्तिशाली साम्राज्यों का उत्थान और पतन देखा है। बाद में शेरशाह सूरी का प्रभाव भी इस क्षेत्र को छूकर गया।
दिलचस्प बात यह है कि 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में जब देश के कई हिस्सों में अंग्रेजों के खिलाफ आग भड़की थी, तब गोह के जमींदारों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का ही साथ दिया था। शायद यही वजह रही कि यह इलाका औद्योगिकीकरण की दौड़ से काफी हद तक दूर रहा।
यह इलाका मुख्य रूप से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर टिका है। यहां धान, गेहूं और दलहन प्रमुख फसलें हैं, जो स्थानीय लोगों की आर्थिक रीढ़ हैं। खेती-बाड़ी के अलावा, बांस से बनी हस्तकला और पारंपरिक मिट्टी के बर्तन बनाने का काम भी यहां रोजगार का एक अहम जरिया है।
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