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मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले दल-बदल से मात देने की होड़

jantaserishta.com
2 July 2023 11:00 AM IST
मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले दल-बदल से मात देने की होड़
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भोपाल (आईएएनएस) मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी दलों में दल-बदल के जरिए एक दूसरे को मात देने की होड़ मची हुई है। यही कारण है कि दोनों दलों के नेताओं की एक दूसरे की कमजोर कड़ी पर पैनी नजर है।
राज्य में इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए दोनों राजनीतिक दल कमर कसे हुए हैं और जीत के लिए कोई भी दांव चलने में संकोच करने में भी पीछे नहीं रहना चाहते। यह बात दोनों राजनीतिक दलों के क्रियाकलाप से ही साफ नजर आ रही है। इसकी वजह भी है क्योंकि विधानसभा चुनाव काफी कशमकश भरे होने के साथ कड़े मुकाबले वाले रहने वाले है।
राज्य में दल-बदल तो वैसे हर चुनाव से पहले होता रहा है और इस बार भी वैसा ही कुछ नजारा है। जो भी नेता अपनी पार्टी से असंतुष्ट है या उसे अपनी महत्वाकांक्षा पूरी होती नजर नहीं आ रही है वह दूसरे दल में अपने लिए संभावनाएं तलाश रहा है।
एक तरफ जहां नेता अपने लिए संभावनाएं तलाश रहे हैं, वहीं दोनों दल -- भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस भी उस नेता की सियासी हैसियत का आकलन कर अपने दरवाजे खोले हुए हैं। पिछले कुछ दिनों में हुए दल-बदल पर हम गौर करें तो पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के पुत्र दीपक जोशी, ग्वालियर चंबल इलाके में यादवेंद्र सिंह यादव, बैजनाथ सिंह यादव और राकेश गुप्ता ने भाजपा का दामन छोड़ कर कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की है। यह वह लोग हैं जो 2020 में हुए दलबदल में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए थे ।
कटनी जिले के विजयराघवगढ़ विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक ध्रुव प्रताप सिंह और वरिष्ठ नेता शंकर महतो भी कांग्रेस का दामन थाम चुके है। वहीं खरगोन के महेश्वर विधानसभा क्षेत्र से विधायक व पूर्व मंत्री विजयलक्ष्मी साधो की बहन प्रमिला साधो ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा है। दोनों ही दलों के असंतुष्ट और नाराज राजनेता दूसरे दल के संपर्क में है। इसी क्रम में जबलपुर के पूर्व मंत्री हरेंद्र जीत सिंह बब्बू की पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से हुई मुलाकात भी चर्चाओं में है, मगर बब्बू ने इस मुलाकात को शिष्टाचार मुलाकात बताया है और भाजपा को अपनी मां भी बताया है, साथ ही दलबदल की संभावनाओं को नकार दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव से पहले राजनीतिक दल इस कोशिश में लगे हैं कि दल-बदल के जरिए इस बात का संदेश देने में सफल हो कि अगली सरकार उन्हीं की आने वाली है क्योंकि जिस दल में ज्यादा लोग पाला बदलकर आते हैं तो आमजन में एक धारणा बनने लगती है कि सरकार इसी दल की आने वाली है। लिहाजा दोनों ही दल पूरा जोर लगाए हुए हैं। मगर वर्तमान स्थितियां कांग्रेस के पक्ष में है क्योंकि ज्यादातर लोग भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए हैं। आने वाले दिनों में इंतजार होगा कि दल-बदल का जोर कितना जोर पकड़ता है।
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