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बाना सिंह: सियाचिन का शेर जो पाकिस्तानी सेना पर मौत बनकर बरसा, परमवीर चक्र विजेता की कहानी

jantaserishta.com
5 Jan 2026 1:45 PM IST
बाना सिंह: सियाचिन का शेर जो पाकिस्तानी सेना पर मौत बनकर बरसा, परमवीर चक्र विजेता की कहानी
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नई दिल्ली: जून 1987 को दुनिया की छत कहे जाने वाले सियाचिन ग्लेशियर की करीब 21,153 फीट ऊंचाई पर तापमान शून्य से 50 डिग्री नीचे था। इस बीच बर्फीली हवाओं के बीच पांच साए धीरे-धीरे बर्फ की एक लगभग सीधी दीवार पर रेंग रहे थे। इनमें सबसे आगे थे नायब सूबेदार बाना सिंह।
सियाचिन पर कब्जा करना पाकिस्तान के लिए एक रणनीतिक सपना था। उन्होंने साल्टोरो रिज की सबसे ऊंची चोटी पर 'कायद पोस्ट' बना ली थी। वहां बैठे पाकिस्तानी कमांडो नीचे से गुजरने वाले हर भारतीय पर नजर रख रहे थे। उनके पास अत्याधुनिक हथियार थे और सबसे बड़ी ताकत थी उनकी ऊंचाई। भारत ने इस पोस्ट को वापस लेने के लिए 'ऑपरेशन राजीव' शुरू किया, लेकिन शुरुआती कोशिशें नाकाम रहीं। सेकेंड लेफ्टिनेंट राजीव पांडे और उनके साथी इस पोस्ट को जीतने की कोशिश में शहीद हो चुके थे।
बाना सिंह का जन्म जम्मू के आरएस पुरा के एक साधारण किसान परिवार में 6 जनवरी 1949 हुआ था। 1969 में सेना में भर्ती हुए।
26 जून 1987 को जब बाना सिंह की टीम को अंतिम हमले की जिम्मेदारी मिली, तो उन्होंने वह रास्ता चुना जिसकी दुश्मन ने कल्पना भी नहीं की थी। उन्होंने 90 डिग्री की खड़ी ढलान वाली बर्फीली दीवार पर चढ़ने का फैसला किया। चारों तरफ घना कोहरा और बर्फीला तूफान था। यही तूफान उनका सुरक्षा कवच बना। बाना सिंह और उनके चार साथी (राइफलमैन चुनी लाल, लक्ष्मण दास, ओम राज और कश्मीर चंद) जब चोटी पर पहुंचे, तो उनके हाथ-पैर जम चुके थे।
चोटी पर पहुंचते ही अत्यधिक ठंड के कारण उनकी राइफलें 'जाम' हो गई थीं। एक तरफ आधुनिक हथियारों से लैस पाकिस्तानी एसएसजी कमांडो थे और दूसरी तरफ बाना सिंह की टीम, जिनके पास सिर्फ साहस और हथगोले थे।
बाना सिंह ने बिना पलक झपकाए दुश्मन के बंकर की ओर रेंगना शुरू किया। उन्होंने बंकर के छोटे से झरोखे से ग्रेनेड अंदर फेंका और अपनी पूरी ताकत से बंकर का दरवाजा बाहर से पकड़ लिया ताकि धमाका अंदर ही हो। देखते ही देखते बंकर तबाह हो गया। इसके बाद जो हुआ, वह सैन्य इतिहास की सबसे भीषण 'हैंड-टू-हैंड' फाइट थी। भारतीय शेरों ने संगीनों से हमला बोल दिया। कुछ पाकिस्तानी सैनिक तो डर के मारे चोटी से नीचे कूद गए। शाम चार बजे तक 'कायद पोस्ट' पर तिरंगा लहरा रहा था। भारत सरकार ने इस अदम्य साहस के सम्मान में इस चोटी का नाम हमेशा के लिए 'बाना टॉप' रख दिया।
26 जनवरी 1988 को बाना सिंह को सेना के सर्वोच्च सम्मान 'परमवीर चक्र' से नवाजा गया। लेकिन एक असली हीरो की परीक्षा युद्ध के मैदान के बाद भी जारी रही। रिटायरमेंट के बाद जब वह अपने गांव काद्याल लौटे, तो उन्हें आर्थिक तंगी और प्रशासनिक उपेक्षा का सामना करना पड़ा। जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा उन्हें दी जाने वाली पेंशन पड़ोसी राज्यों (जैसे पंजाब) के मुकाबले बेहद कम थी।
2006 में पंजाब सरकार ने उन्हें लाखों रुपए और जमीन देने की पेशकश की थी, लेकिन बाना सिंह ने कहा, "मैं जम्मू-कश्मीर का बेटा हूं और अपनी मिट्टी नहीं छोड़ूंगा, चाहे मुझे कितनी ही तंगी क्यों न झेलनी पड़े।"
2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंडमान के एक द्वीप का नाम 'बाना आइलैंड' रखकर उनकी वीरता को अमर कर दिया।
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