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अरावली मामला: सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले पर लगाई रोक, स्वत: लिया था संज्ञान

jantaserishta.com
29 Dec 2025 12:43 PM IST
अरावली मामला: सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले पर लगाई रोक, स्वत: लिया था संज्ञान
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अरावली पहाड़ियों से जुड़े 20 नवंबर के आदेश को अगली सुनवाई तक लागू नहीं किया जाएगा. कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख 21 जनवरी 2026 तय की है. तब तक यथास्थिति बनी रहेगी और सभी अहम पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जाएगा.

अरावली मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा कि कोर्ट की कुछ परिणामी टिप्पणियों को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है, जिस पर स्पष्टता जरूरी है. CJI ने कहा कि 20 नवंबर के आदेश को लागू करने से पहले एक निष्पक्ष और ठोस रिपोर्ट अनिवार्य है. उन्होंने अरावली पहाड़ियों और रेंज की परिभाषा, 500 मीटर से ज्यादा दूरी की स्थिति, माइनिंग पर रोक या अनुमति और उसके दायरे को लेकर गंभीर अस्पष्टताओं को सुलझाने की जरूरत बताई.
अरावली मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस मुद्दे को समग्र रूप से देखने की जरूरत है और कोर्ट द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को स्वीकार किया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विशेषज्ञों द्वारा एक ठोस माइनिंग प्लान तैयार किया जाएगा, जिसे कोर्ट की मंजूरी के बाद ही लागू किया जाएगा. इस प्रक्रिया में पब्लिक कंसल्टेशन भी होगा. CJI ने इस पहल की सराहना की.
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली पहाड़ियां थार रेगिस्तान को दिल्ली-NCR तक फैलने से रोकने वाली हरी दीवार हैं. लेकिन 10-30 मीटर ऊंची पहाड़ियों को "नॉन-हिल" मानने से उनके खत्म होने का खतरा बढ़ेगा. इससे धूल भरी आंधियां, भूजल स्तर में गिरावट और उत्तर भारत में वायु प्रदूषण और गंभीर हो सकता है.
अरावली में खनन को लेकर विवाद की शुरुआत 1996 में अवैध खनन के खिलाफ याचिका से हुई थी. 2002 और 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने वन भूमि में खनन पर रोक लगाई, लेकिन स्पष्ट परिभाषा न होने से गैप बने रहे. इसी का फायदा उठाकर 2018 तक राजस्थान में कम से कम 31 पहाड़ खत्म हो गए. 2025 का फैसला इन्हीं कानूनी कमियों को दूर करने की कोशिश के तौर पर लाया गया.
केंद्र सरकार ने अरावली की नई परिभाषा को लेकर उठ रहे सवालों पर सफाई दी. 24 दिसंबर को केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने कहा कि अरावली का 99% हिस्सा अब भी संरक्षित है और इसे "डेथ वारंट" बताना गलत है. उनका तर्क है कि नई परिभाषा से सिर्फ चोटियां ही नहीं, बल्कि पहाड़ियों की ढलान और आधार भी संरक्षण में आते हैं. सरकार के मुताबिक सख्त शर्तों के तहत भी महज 0.19% क्षेत्र ही खनन के लिए संभावित रूप से पात्र हो सकता है.
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