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राम मंदिर के निर्माण-कार्य के बीच ट्रस्ट पर लगा घोटाले का आरोप, भक्तों की आस्था को पहुंची चोट

Chandravati Verma
14 Jun 2021 5:13 PM GMT
राम मंदिर के निर्माण-कार्य के बीच ट्रस्ट पर लगा घोटाले का आरोप, भक्तों की आस्था को पहुंची चोट
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अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू हो चुका है

अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू हो चुका है. इस बीच ट्रस्ट पर घोटाले का पहला आरोप भी लग चुका है. जिसने देश के सौ करोड़ रामभक्तों की आस्था को हिला दिया है. क्या है इसकी इनसाइड स्टोरी… आज हम विस्तार से दिखाएंगे. अयोध्या में राम मंदिर को लेकर जिस घोटाले के आरोप लग रहे हैं, वो पंद्रह मिनट की डील है. आज हम इस पंद्रह मिनट की मिस्ट्री के साथ-साथ लैंड डील की पूरी हिस्ट्री बताएंगे. लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास के सामने हो रहे इस विरोध प्रदर्शन की वजह वही आरोप हैं जो श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर लगाए जा रहे हैं. पूरा मामला जमीन की खरीद से जुड़ा हुआ है. पहले ये समझिए कि ट्रस्ट आखिर जमीन खरीद ही क्यों रहा है. दरअसल, ट्रस्ट को केंद्र सरकार की तरफ से 70 एकड़ जमीन मिली तो थी, लेकिन नए प्लान के मुताबिक मंदिर परिसर का विस्तार होने की वजह से ज्यादा जमीन की जरूरत पड़ गई जिसकी वजह से आसपास की और जमीन को खरीदा जा रहा है.

आरोप है कि 18 मार्च 2021 को शाम 7 बजकर 10 मिनट पर 2 करोड़ में ये जमीन खरीदी गई. जमीन के मालिक कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने इसे सुल्तान अंसारी, रविमोहन तिवारी को बेच दिया. इस डील के गवाह राम मंदिर तीर्थ ट्रस्ट के सदस्य अनिल मिश्रा और अयोध्या के मेयर ऋषिकेश उपाध्याय थे. आरोप है कि इस डील के कुछ ही मिनटों बाद जमीन को सुल्तान अंसारी और रविमोहन तिवारी ने 18 करोड़ 50 लाख रुपये में राम मंदिर ट्रस्ट को बेच दिया. शाम को 7 बजकर 10 मिनट पर दो करोड़ रुपये में कुसुम पाठक और हरीश पाठक के द्वारा बेची गई. सुल्तान अंसारी और रवि तिवारी ने खरीदा. ठीक पांच मिनट बाद ये जो दो करोड़ में जमीन खरीदी गई जिसकी मालियत 5 करोड़ 80 लाख है. वो राम जन्मभूमि ट्रस्ट ने साढ़े 18 करोड़ की खरीद ली.
श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का कहना है कि जमीन को खरीदने के लिए विक्रेता यानी सुल्तान अंसारी और रविमोहन तिवारी ने वर्षों पूर्व जिस मूल्य पर रजिस्टर्ड अनुबंध कराया था. उस जमीन को उन्होंने 18 मार्च 2021 को बैनामा कराया और उसके बाद ट्रस्ट के साथ अनुबंध किया. जो भी हो, सच्चाई सामने आनी चाहिए. आखिर कम दाम की जमीन ज्यादा कीमत पर क्यों खरीदी गई? पुराने एग्रीमेंट के आधार पर नया सौदा कैसे हुआ. दोनों खरीद के वक्त एक ही गवाह क्यों रखे गए. हमने इन सवालों का जवाब तैयार करने की कोशिश की है.
पहला सवाल ये है कि ट्रस्ट को जमीन बेचने वालों ने पुराने एग्रीमेंट के आधार पर जमीन कैसे खरीदी? टीवी 9 भारतवर्ष की पड़ताल में ये सामने आया कि किसी भी जमीन की खरीद का एग्रीमेंट 6 महीने तक मान्य होता है. लेकिन उसके बाद वो अमान्य हो जाता है. इसी तरह अगर उस जमीन पर कोई विवाद है तो विवाद खत्म होने तक एग्रीमेंट को वैध माना जाता है. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर इस जमीन को लेकर कोई विवाद था तो वो क्या विवाद था. जाहिर है कि इसका जवाब विक्रेता और ट्रस्ट को देना होगा.
दूसरा सवाल ये है कि क्या सर्किल रेट के मुताबिक इस जमीन की खरीद-फरोख़्त हुई है और सर्किल रेट है क्या? हमारी पड़ताल में सामने आया कि अयोध्या में साल 2017 से सर्किल रेट में कोई बदलाव नहीं आया है, लिहाजा 4800 रुपए प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से ये करीब 5 करोड़ 80 लाख रुपये की जमीन थी. अगर स्टाम्प वैल्यू सही है तो सर्किल रेट से कम में जमीन खरीदी या बेची जा सकती है. हालांकि इस जमीन को सर्किल रेट की तुलना में बहुत ज्यादा कीमत मिली है. ये भी एक वजह है कि सवाल उठ रहे हैं. सवाल ये भी है कि जमीन सर्किल रेट से ज़्यादा पर क्यों खरीदी गई? इसका जवाब ये है कि जमीन की कीमत का निर्धारण क्रेता और विक्रेता की सहमति से होता है. जो कि इस मामले में होता दिख रहा है. दोनों ही क्रय पत्र में जमीन आवासीय ही दर्ज है.
इस पूरे मामले में गवाहों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. एक गवाह हैं ट्रस्टी अनिल मिश्रा और दूसरे गवाह मेयर ऋषिकेश उपाध्याय. सवाल ये कि दोनों खरीद में इन्हीं दोनों को गवाह क्यों बनाया गया है? दरअसल, इसका जवाब ट्रस्ट को देना है. क्योंकि अगर ट्रस्ट ने रवि मोहन तिवारी और सुल्तान अंसारी से जमीन खरीदी तो इन दोनों के गवाह बनने में कोई दिक़्कत नहीं है, लेकिन विक्रेता ने जब वही जमीन कुसुम पाठक और हरीश पाठक से खरीदी तो उसमें भी यही दोनों गवाह थे. इसी को लेकर विपक्ष हमलावर है और इसका जवाब ट्रस्ट को देना है.
आखिर में आप सुल्तान अंसारी का जवाब सुन लीजिए. हमने उनसे पूछा कि जो जमीन आपने 2 करोड़ में खरीदी वो इतनी महंगी कैसे हो गई? सुल्तान अंसारी ने कहा कि हमारी जमीन बहुत कीमती थी. 50 करोड़ की थी. आस्था को देखते हुए 18 करोड़ में सौदा किया. सन 2011 में एग्रीमेंट कराया था. अब 10 सवाल हो गए हैं. पहले कीमत कम थी. मंदिर के फैसले के बाद वो जगह आज के सरकारी सर्किल रेट के हिसाब से 25 करोड़ की जमीन है. सर्किल रेट से नीचे दिया है. भ्रष्टाचार को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन बिना ठोस पड़ताल के किसी नतीजे पर पहुंचने की हड़बड़ी भी एक बड़ी फिक्र है. इससे बचना चाहिए.


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