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बाल विवाह पर चिंताजनक स्थिति: भारत में हर 5 में से 1 महिला पीड़ित
Tara Tandi
11 Oct 2026 6:19 PM IST

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नई दिल्ली: भारत ने बाल विवाह से निपटने में प्रगति की है, लेकिन यह प्रथा अभी भी लाखों लड़कियों को प्रभावित कर रही है। विशेषज्ञ बच्चों की सुरक्षा और यह सुनिश्चित करने के लिए मज़बूत और खास कोशिशों की मांग कर रहे हैं कि वे अपनी शिक्षा पूरी कर सकें और अपने भविष्य के बारे में फ़ैसले ले सकें।
PTI की रिपोर्ट में बताए गए UNICEF और सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर पांच में से एक युवा महिला की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो गई थी। दुनिया भर में बाल विवाह का शिकार होने वाली हर तीन लड़कियों में से लगभग एक भारत से है। यह इस चुनौती के बड़े पैमाने को दिखाता है, भले ही राष्ट्रीय स्तर पर इसकी दर में काफी कमी आई है।
11 अक्टूबर को मनाए जाने वाले 'अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस' के मौके पर इस मुद्दे को उठाया गया। विशेषज्ञों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि राष्ट्रीय औसत राज्यों और ग्रामीण व शहरी समुदायों के बीच बड़े अंतर को छिपा सकता है।
बाल विवाह के आधे से ज़्यादा मामले पांच राज्यों में होते हैं
रिपोर्ट में बताए गए UNICEF और सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में बाल विवाह के आधे से ज़्यादा मामले उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में होते हैं।
केरल और लक्षद्वीप उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शामिल हैं, जहां इस मुद्दे पर बेहतर स्थिति देखी गई है।
CRY (चाइल्ड राइट्स एंड यू) की CEO पूजा मारवाह ने कहा कि बाल विवाह में कमी आना उत्साहजनक है, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि अभी भी हर पांच में से एक युवा महिला को वयस्क होने से पहले शादी का सामना करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय औसत राज्यों और ग्रामीण व शहरी इलाकों के बीच बड़े अंतर को छिपा देता है, इसलिए खास तौर पर ध्यान देने वाले उपायों की ज़रूरत है।
ये आंकड़े बताते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रगति का मतलब यह नहीं है कि हर समुदाय की लड़कियों को एक जैसे जोखिमों का सामना करना पड़ता है।
गरीबी और सीमित अवसर लड़कियों को जोखिम में डालते हैं
विशेषज्ञों ने गरीबी, सामाजिक रीति-रिवाजों और अवसरों तक सीमित पहुंच को ऐसे कारकों के तौर पर पहचाना है जो बाल विवाह का कारण बन सकते हैं।
'जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन' के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत ने कहा कि गरीब परिवारों में बाल विवाह अभी भी आम है। उन्होंने तर्क दिया कि आर्थिक तंगी के कारण कुछ माता-पिता अपनी बेटियों की जल्दी शादी कर सकते हैं क्योंकि उन्हें उनकी देखभाल करने में मुश्किल होती है।
कांत ने कहा कि इन दबावों से निपटने के लिए सरकारी कल्याणकारी योजनाएं और समुदाय-स्तर पर किए जाने वाले उपाय महत्वपूर्ण होंगे।
बाल विवाह लड़की की शिक्षा में रुकावट डाल सकता है, उसके भविष्य के रोज़गार के अवसरों को सीमित कर सकता है और उसके जीवन से जुड़े फ़ैसलों पर उसके नियंत्रण को कम कर सकता है। इसका संबंध कम उम्र में गर्भवती होने, घरेलू हिंसा और लंबे समय तक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले बुरे असर से भी है।
इन असर से गरीबी और लैंगिक असमानता का चक्र और मजबूत हो सकता है, जिससे लड़कियों के लिए शिक्षा, आर्थिक आजादी और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
यूनिसेफ लड़कियों के लिए लगातार निवेश की मांग करता है
यूनिसेफ इंडिया की प्रतिनिधि सिंथिया मैककैफ्री ने कहा कि भारत ने शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, बाल सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्रों में लगातार कोशिशों से लड़कियों के अधिकारों को आगे बढ़ाने और बाल विवाह को कम करने में अहम प्रगति की है।
उन्होंने कहा कि आगे और प्रगति के लिए किशोरावस्था के दौरान लगातार निवेश की जरूरत होगी ताकि लड़कियां स्कूल में बनी रह सकें, स्वस्थ और सुरक्षित रह सकें, कौशल विकसित कर सकें और अवसरों का लाभ उठा सकें।
मैककैफ्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि लड़कियों को केवल विकास कार्यक्रमों के लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि अपने परिवारों और समुदायों में सक्रिय योगदानकर्ता के रूप में पहचाना जाना चाहिए।
मरवाहा ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति सही दिशा में बढ़ रही है, लेकिन बाल विवाह को खत्म करने के लिए उन समुदायों और भौगोलिक क्षेत्रों के हिसाब से कदम उठाने होंगे जहां यह प्रथा अभी भी प्रचलित है।
बाल विवाह के बारे में भारतीय कानून क्या कहता है?
भारत के बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के तहत, बच्चे की परिभाषा इस प्रकार है: ऐसा पुरुष जिसने 21 साल की उम्र पूरी नहीं की है या ऐसी महिला जिसने 18 साल की उम्र पूरी नहीं की है। यह कानून बाल विवाह को रोकने और उनसे जुड़े कानूनी नतीजों से निपटने के लिए एक ढांचा प्रदान करता है।
पीटीआई की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत, किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना, जब पत्नी की उम्र 18 साल से कम हो, बलात्कार की कानूनी परिभाषा के दायरे में आता है। इसके सटीक कानूनी नतीजे परिस्थितियों और लागू प्रावधानों पर निर्भर कर सकते हैं।
बाल विवाह से निपटने के लिए भारत की कोशिशें 19वीं सदी के समाज सुधार आंदोलनों के समय से ही शुरू हो गई थीं। राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर और महात्मा ज्योतिराव फुले जैसे समाज सुधारकों ने महिलाओं और लड़कियों पर असर डालने वाली हानिकारक प्रथाओं के खिलाफ अभियान चलाया था।
एज ऑफ कंसेंट एक्ट, 1891 और चाइल्ड मैरिज रेस्ट्रेन्ट एक्ट, 1929 शुरुआती कानूनी उपायों में शामिल थे। बाद में शादी की न्यूनतम उम्र महिलाओं के लिए 18 साल और पुरुषों के लिए 21 साल कर दी गई। 2024 में, सरकार ने 'बाल विवाह मुक्त भारत' अभियान शुरू किया। यह अभियान 2030 तक बाल विवाह, कम उम्र में शादी और ज़बरदस्ती शादी जैसी हानिकारक प्रथाओं को खत्म करने के संयुक्त राष्ट्र के 'सतत विकास लक्ष्य' (Sustainable Development Goal) को हासिल करने की कोशिशों का हिस्सा है।
समुदाय की भागीदारी अहम है।
'जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन' ने कहा कि वह बाल विवाह रोकने के लिए पंचायतों और सरकारी संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर रही है।
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