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मां की मौत के बाद इंजीनियर बेटे को लगा सदमा, नौकरी छोड़कर शुरू किया ये काम

Admin2
11 Jun 2021 10:17 AM GMT
मां की मौत के बाद इंजीनियर बेटे को लगा सदमा, नौकरी छोड़कर शुरू किया ये काम
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औधोगिक क्षेत्र का प्रदूषण

झारखंड में धनबाद शहर को कोयले की राजधानी के रूप में जानते है. इस राजधानी का मतलब औधोगिक क्षेत्र का प्रदूषण. आज धनबाद प्रदूषण के लिये भी जाना जाने लगा है. यही प्रदूषण किसी बेटे से उसकी मां का साया भी छीन लेता है. मां की मौत से बेटा सदमे में चला गया. इसके बाद संकल्प लेकर धनबाद को हरा भरा बनाने और पर्यावरण को स्वच्छ करने की मुहिम शुरू कर दी. नौकरी छोड़ने के बाद सॉफ्टवेयर इंजीनियर आज एक सफल किसान की भूमिका में है. ना सिर्फ वह खुद से खेती कर रहें हैं, बल्कि अपने गांव छोड़कर दूसरे राज्यों में रोजगार की तालाश में भटकने वाले प्रवासी मजदूरों को भी खेती के लिए प्रेरित भी करते हैं.

खेती के गुर सीखने के बाद कुछ अपने जमीन पर खेती कर रही तो कई लोग सॉफ्टवेयर इंजीनियर के विभिन्न स्थानों पर सब्जियों और फलों की खेती कर अपना जीवन यापन कर रहें हैं. एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर आखिर कैसे सफल किसान बना. धनबाद जिले के भूली में रहनेवाले रवि निषाद जो दिल्ली के नोएडा की एक प्राइवेट कंपनी में सॉफ्ट इंजीनियर के रूप में नौकरी करते थे. मां की तबीयत बिगड़ने के वापस धनबाद लौट आए. मां की इलाज के लिए सीएमसी वेलोर तक गए, लेकिन मां को बचा नही सके. डॉक्टरों ने प्रदूषण के कारण माँ की मौत होना बताया. इसके बाद रवि फिर कभी वापस लौट कर दिल्ली नही गया. प्रदूषण भरे कोयलांचल के पर्यावरण को शुद्ध करने की ठानी.

इसके लिए उन्होंने लोगों पेड़ पौधे लगाने के लिए जागरूक किया।लोगों के बीच पौधों का वितरण किया ताकि हरियाली लाई जा सके, लेकिन इस कार्य से भी मन को संतुष्टि नही मिली. जिसके बाद रवि ने खेती शुरू की और यहां पर रवि एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के बजाय सफल किसान कहलाने लगा. जैविक खेती उन्होंने शुरू किया. भूली मोड़ के आरपीए फार्मिंग सेंटर की शुरुआत की. आज रवि के द्वारा करीब 110 एकड़ में सब्जी और फलों की खेती की जा रही है. रवि ने खेती के माध्यम से अन्य लोगों को भी रोजगार से जोड़ा है. उनमें से कई लोग रवि द्वारा लीज पर लिए गए जमीन पर खेती कर रहें हैं तो कई लोग खुद अपने खेत मे फ़सल लगाकर आजीविका चला रहें हैं.

कोरोना काल मे दूसरे राज्यों में काम कर वापस लौटे प्रवासी मजदूरों को भी आरपीए फार्मिंग का सहारा मिला है. वैसे प्रवासी मजदूरों की भी जीविका आइपीए फार्मिंग से चल रही है. प्रवासी मजदूर अब बाहर नही चाहते हैं. टुंडी के रहने वाले महेश किस्कू ने बताया कि हमारे साथ कई लोग हैदराबाद में काम करते थे. लॉकडाउन में सभी वापस घर आ गए. सभी साथी आरपीए फार्मिंग से अब जुड़ चुके हैं. रेलवे में आउटसोर्सिंग पर काम करने वाले बिनोद वर्मा को भी आरपीए के सहारे जीवन चल रहा है. कोरोना के कारण उनकी भी नौकरी छूट गई थी. रूपेश महतो माइंस में ड्रिल ऑपरेटर की नौकरी छोड़कर खेती बारी से जुड़ गए. आरपीए फार्मिंग के जरिए ही इनकी भी आजीविका चल रही है.


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