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सफल छात्र आंदोलन से होगा सभी का फायदा: महान्ति

Saba Naaz
25 July 2026 9:38 PM IST
सफल छात्र आंदोलन से होगा सभी का फायदा: महान्ति
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नई दिल्ली। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जंतर-मंतर पर पिछले 36 दिनों से चल रहा छात्र आंदोलन समाप्त हो गया है। इस आंदोलन को लेकर समाजशास्त्री और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर मनोरंजन महान्ति ने कहा है कि इसका सफल होना छात्रों, सरकार, विपक्ष और पूरे देश के हित में है। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन खत्म हुआ है, लेकिन जिस मुद्दे को लेकर यह आंदोलन खड़ा हुआ है, वह अभी भी जीवित है और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत बनी हुई है।

प्रोफेसर महान्ति ने कहा कि यह आंदोलन केवल परीक्षा में गड़बड़ी या पेपर लीक तक सीमित नहीं था, बल्कि छात्र देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और सुधार की मांग कर रहे थे। उनके अनुसार, युवा चाहते हैं कि तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ कला, साहित्य, संस्कृति और भाषाओं को भी समान महत्व मिले। साथ ही परीक्षा प्रणाली को ईमानदार और भरोसेमंद बनाया जाए, ताकि छात्रों को अपने भविष्य को लेकर चिंता न करनी पड़े।

उन्होंने कहा कि अगर सरकार छात्रों की मांगों को गंभीरता से लेकर शिक्षा व्यवस्था में सुधार करती है तो इससे युवाओं का विश्वास सरकार और व्यवस्था दोनों में मजबूत होगा। उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार के साथ-साथ जिन राज्यों में अलग-अलग सरकारें हैं, उन्हें भी परीक्षा प्रणाली और भर्ती प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाने के लिए कदम उठाने चाहिए, क्योंकि कई राज्यों में भी पेपर लीक और परीक्षा संबंधी विवाद सामने आते रहे हैं।

प्रोफेसर महान्ति ने जेन-जी के इस आंदोलन को देश के अन्य बड़े आंदोलनों से अलग बताया। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति या चेहरे के नेतृत्व में नहीं चला, बल्कि यह व्यवस्था से परेशान युवाओं की सामूहिक आवाज थी। उनके अनुसार, यह एक चेहराविहीन आंदोलन था, जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्र अपनी समस्याओं को लेकर जंतर-मंतर पहुंचे।

उन्होंने कहा कि सोनम वांगचुक और अभिजीत दीपके जैसे लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण रही, लेकिन वे इस आंदोलन का पूरा चेहरा नहीं थे। आंदोलन के पीछे युवाओं की अपनी चिंताएं और समस्याएं थीं। उन्होंने कहा कि बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और शिक्षा व्यवस्था की कमियां युवाओं की नाराजगी का बड़ा कारण हैं।

आंदोलनों पर सरकारों के रवैये को लेकर भी प्रोफेसर महान्ति ने अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में कई बार सरकारें शुरुआत में आंदोलनों को लेकर सतर्क रहती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि जनता ने उन्हें निर्णय लेने का अधिकार दिया है। वहीं दूसरी ओर, जनता अपनी समस्याओं और अधिकारों को लेकर आवाज उठाती है, जिससे सरकार और जनता के बीच संवाद की स्थिति बनती है।

शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को लेकर उन्होंने कहा कि केवल किसी मंत्री का पद छोड़ना व्यवस्था में तुरंत बदलाव नहीं ला सकता, लेकिन यह एक नैतिक संदेश जरूर देता है। उन्होंने कहा कि इससे छात्रों को यह महसूस होगा कि उनकी आवाज सुनी गई है और सरकार उनकी समस्याओं को गंभीरता से ले रही है।

आंदोलन में असामाजिक तत्वों और राजनीतिक हस्तक्षेप के सवाल पर प्रोफेसर महान्ति ने कहा कि इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ लोग किसी भी बड़े आंदोलन का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि छात्रों की वास्तविक समस्याओं को नजरअंदाज किया जाए। सरकार को चाहिए कि वह गलत तत्वों पर कार्रवाई करे और छात्रों की जायज मांगों पर ध्यान दे।

उन्होंने छात्रों को भी सलाह दी कि आंदोलन हमेशा शांतिपूर्ण तरीके से चलना चाहिए और बातचीत के रास्ते खुले रखने चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंसक आंदोलन से वास्तविक मुद्दा कमजोर हो सकता है और गलत ताकतों को मौका मिल सकता है।

प्रोफेसर महान्ति ने कहा कि कोई भी आंदोलन पूरी तरह असफल नहीं होता। भले ही तत्काल सभी मांगें पूरी न हों, लेकिन आंदोलन अपने पीछे बदलाव का बीज छोड़ जाता है। समय के साथ सरकारों को नीतियों में सुधार करना पड़ता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि देश में कई बड़े आंदोलन हुए, जिनके बाद नीतियों में बदलाव आया।

उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में निवेश की जरूरत पर भी जोर दिया। प्रोफेसर महान्ति ने कहा कि भारत को शिक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए अधिक संसाधन लगाने होंगे। उन्होंने चीन का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां शिक्षा और शोध पर लगातार निवेश किया गया, जिसकी वजह से वह आज तकनीक और शोध के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है।

उन्होंने उम्मीद जताई कि छात्र आंदोलन से निकली आवाज आने वाले समय में देश की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने में मदद करेगी। उनके अनुसार, यह आंदोलन केवल एक विरोध नहीं था, बल्कि युवाओं की बेहतर भविष्य और पारदर्शी व्यवस्था की मांग थी, जिसे गंभीरता से समझने की जरूरत है।

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