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संसद की मुहर से बदलेगा 135 साल पुराना बैंकिंग कानून

nidhi
11 Aug 2026 6:47 AM IST
संसद की मुहर से बदलेगा 135 साल पुराना बैंकिंग कानून
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डिजिटल बैंकिंग रिकॉर्ड को कानूनी सबूत की मंजूरी संसद ने पास किया नया बिल
नई दिल्ली: भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में तेजी से हो रहे डिजिटल बदलावों के बीच संसद ने एक महत्वपूर्ण कानून को मंजूरी दे दी है। Bankers’ Books Evidence Bill, 2026 को दोनों सदनों से पारित कर दिया गया है। यह नया कानून Bankers’ Books Evidence Act, 1891 की जगह लेगा, जो करीब 135 वर्षों से बैंकिंग रिकॉर्ड को अदालतों में साक्ष्य के तौर पर पेश करने से जुड़े नियमों को नियंत्रित करता था। लोकसभा ने बिल को 5 अगस्त को मंजूरी दी थी, जबकि राज्यसभा ने 10 अगस्त को इसे पारित किया।
नए कानून की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बैंकिंग रिकॉर्ड की बदलती तकनीकी प्रकृति को ध्यान में रखा गया है। अब बैंक रिकॉर्ड केवल कागजी बही-खातों तक सीमित नहीं माने जाएंगे, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल, वर्चुअल और क्लाउड आधारित रिकॉर्ड को भी कानूनी साक्ष्य के रूप में मान्यता देने का प्रावधान किया गया है।
135 साल पुराने कानून की जगह क्यों?
Bankers’ Books Evidence Act वर्ष 1891 में बनाया गया था। उस दौर में बैंकिंग व्यवस्था मुख्य रूप से कागज पर आधारित थी। बैंक अपने ग्राहकों के लेनदेन और खातों का रिकॉर्ड बड़ी-बड़ी कागजी पुस्तकों और रजिस्टरों में रखते थे। उस समय कानून बनाने का उद्देश्य यह था कि किसी मुकदमे में बैंक के रिकॉर्ड की जरूरत पड़ने पर बैंक को अपनी पूरी मूल बही अदालत में लेकर जाने या बैंक अधिकारी को हर मामले में गवाही देने के लिए बुलाने की जरूरत न पड़े।
पुराने कानून के तहत बैंक रिकॉर्ड की प्रमाणित प्रतियां अदालत में साक्ष्य के रूप में स्वीकार की जा सकती थीं। इससे बैंकिंग संस्थानों को मुकदमों के दौरान अपने मूल रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने में मदद मिलती थी और अदालतों में बैंकिंग लेनदेन साबित करने की प्रक्रिया भी आसान होती थी। लेकिन 21वीं सदी में बैंकिंग का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। आज अधिकांश लेनदेन मोबाइल ऐप, इंटरनेट बैंकिंग, कोर बैंकिंग सिस्टम, डिजिटल वॉलेट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से होते हैं। ऐसे में 1891 में बनाए गए कानून को मौजूदा डिजिटल बैंकिंग व्यवस्था के अनुरूप बनाना जरूरी हो गया था।
डिजिटल रिकॉर्ड को मिलेगा स्पष्ट कानूनी आधार
नए बिल में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक बैंक रिकॉर्ड को स्पष्ट रूप से कानूनी साक्ष्य के रूप में मान्यता देना है। Bill के मुताबिक, बैंक की किताबों या रिकॉर्ड में शामिल इलेक्ट्रॉनिक अथवा डिजिटल रिकॉर्ड अदालत में admissible, valid और legally enforceable evidence हो सकते हैं, बशर्ते निर्धारित शर्तें पूरी हों। इसका मतलब है कि किसी बैंक खाते के डिजिटल रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक स्टेटमेंट या अन्य डिजिटल जानकारी को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकेगा कि वह कागज पर मौजूद नहीं है।
क्लाउड में रखा बैंक रिकॉर्ड भी दायरे में
नए कानून में 'bankers’ books' की परिभाषा को व्यापक किया गया है। इसमें बैंक द्वारा रखे जाने वाले रिकॉर्ड के physical, electronic, digital, virtual और cloud-based रूपों को शामिल किया गया है।
यह बदलाव खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिक बैंकिंग में डेटा अक्सर बैंक की किसी एक शाखा में कागज के रूप में मौजूद नहीं होता। रिकॉर्ड केंद्रीय सर्वर, डेटा सेंटर या क्लाउड आधारित सिस्टम में संग्रहीत हो सकते हैं। पुराने कानून की भाषा मुख्य रूप से उस समय की बैंकिंग व्यवस्था के अनुरूप थी, जबकि नया कानून तकनीक के किसी एक विशेष स्वरूप पर निर्भर नहीं रहने की कोशिश करता है। इसलिए इसे technology-neutral और future-ready framework के रूप में देखा जा रहा है।
अदालतों में बैंक रिकॉर्ड पेश करना होगा आसान
मान लीजिए किसी व्यक्ति के बैंक खाते से जुड़े लेनदेन को लेकर अदालत में विवाद है। पुराने समय में बैंक अधिकारी को कागजी रिकॉर्ड की प्रमाणित प्रति पेश करनी पड़ सकती थी। लेकिन आज उसी जानकारी का मूल स्रोत किसी डिजिटल सिस्टम में हो सकता है। नए कानून के तहत ऐसे इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को निर्धारित प्रमाणन के साथ अदालत में पेश किया जा सकेगा। इससे बैंकिंग विवादों से जुड़े मुकदमों में रिकॉर्ड पेश करने की प्रक्रिया अधिक व्यावहारिक और तकनीक के अनुरूप होने की उम्मीद है।
सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया होगी मानकीकृत
नए बिल में बैंक रिकॉर्ड को प्रमाणित करने की प्रक्रिया को भी आधुनिक बनाने का प्रयास किया गया है। इसमें manual, digital और electronic signatures के जरिए प्रमाणीकरण की व्यवस्था का प्रावधान है। यानी रिकॉर्ड को केवल पारंपरिक हस्ताक्षर वाले कागजी प्रमाणपत्र से ही प्रमाणित करना जरूरी नहीं होगा। डिजिटल बैंकिंग के दौर में यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि बैंक के रिकॉर्ड इलेक्ट्रॉनिक रूप में तैयार और सुरक्षित किए जाते हैं। मानकीकृत प्रमाणन से अदालतों को यह निर्धारित करने में भी मदद मिल सकती है कि प्रस्तुत रिकॉर्ड वास्तविक है या नहीं और उसमें किसी तरह की छेड़छाड़ तो नहीं हुई।
रिकॉर्ड की सत्यता और छेड़छाड़ पर खास जोर
डिजिटल रिकॉर्ड को अदालत में स्वीकार करने के लिए केवल उसका इलेक्ट्रॉनिक होना पर्याप्त नहीं होगा। बिल में रिकॉर्ड की प्रामाणिकता और डेटा की अखंडता से जुड़ी शर्तें भी रखी गई हैं। प्रमाणित प्रति को वास्तविक रिकॉर्ड का सही प्रतिनिधित्व करना चाहिए। इसके अलावा डेटा में अनधिकृत बदलाव या रिकॉर्ड के सिस्टम से छेड़छाड़ जैसी स्थिति नहीं होनी चाहिए। इससे डिजिटल साक्ष्य की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है।
बैंक अधिकारियों को अदालत में बुलाने के नियम
पुराने कानून में भी एक महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था थी। किसी ऐसे मुकदमे में जिसमें बैंक स्वयं पक्षकार नहीं है, बैंक अधिकारी को बैंक की किताबें पेश करने या गवाही देने के लिए सामान्य तौर पर मजबूर नहीं किया जा सकता था, जब तक अदालत या न्यायाधीश विशेष कारण के आधार पर ऐसा आदेश न दें। नए बिल में इस व्यवस्था को बरकरार रखते हुए 'special cause' की अवधारणा को अधिक स्पष्ट किया गया है।
ऐसे विशेष कारणों में रिकॉर्ड की सटीकता या वास्तविकता को लेकर संदेह, रिकॉर्ड रखने की सामान्य प्रक्रिया में व्यवधान या अदालत के आदेश का पालन न करना जैसी परिस्थितियां शामिल हो सकती हैं।
वित्तीय क्षेत्र की अन्य संस्थाओं तक बढ़ सकता है दायरा
नए कानून में केंद्र सरकार को कुछ शर्तों के साथ वित्तीय क्षेत्र में काम करने वाली अन्य संस्थाओं या संस्थाओं की किसी श्रेणी तक इसके प्रावधानों को लागू करने की शक्ति देने का भी प्रावधान है। इससे भविष्य में कानून का दायरा बैंकिंग से आगे वित्तीय क्षेत्र के कुछ अन्य हिस्सों तक बढ़ाया जा सकता है।
UPI और डिजिटल बैंकिंग के दौर में बड़ा बदलाव
भारत में पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल भुगतान में जबरदस्त वृद्धि हुई है। UPI, मोबाइल बैंकिंग और इंटरनेट बैंकिंग के कारण बैंकिंग रिकॉर्ड की प्रकृति भी बदल गई है। आज एक सामान्य बैंक ग्राहक के लेनदेन का रिकॉर्ड किसी शाखा की भौतिक बही में नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में दर्ज होता है। ऐसे में कानून में डिजिटल रिकॉर्ड की स्पष्ट मान्यता देना मौजूदा बैंकिंग व्यवस्था के अनुरूप कदम माना जा रहा है।
सरकार का तर्क है कि जब अर्थव्यवस्था और बैंकिंग तेजी से डिजिटल हो रही है, तो कानूनी ढांचा भी उसी गति से बदलना चाहिए। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में कहा कि 1891 का कानून उस दौर में बनाया गया था जब बैंकिंग पूरी तरह कागज आधारित थी, जबकि आज बैंकिंग और वित्तीय लेनदेन बड़े पैमाने पर डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए संचालित होते हैं।
आम बैंक ग्राहक पर क्या असर पड़ेगा?
आम ग्राहक के लिए यह कानून सीधे तौर पर बैंक खाते के संचालन के नियम नहीं बदलता। इसका मुख्य उद्देश्य बैंकिंग रिकॉर्ड को अदालत में साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल करने की कानूनी प्रक्रिया को आधुनिक बनाना है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी बैंक लेनदेन को लेकर अदालत में विवाद होता है, तो बैंक डिजिटल रिकॉर्ड प्रस्तुत कर सकता है और निर्धारित प्रमाणन के आधार पर उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। इससे मुकदमों में रिकॉर्ड उपलब्ध कराने और उनकी प्रमाणिकता साबित करने की प्रक्रिया अधिक सरल हो सकती है।
बैंकिंग विवादों में तेजी आने की उम्मीद
नए कानून का एक बड़ा फायदा न्यायिक प्रक्रिया में भी देखने को मिल सकता है। बैंकिंग रिकॉर्ड से जुड़े मामलों में अदालतों को अब डिजिटल दस्तावेजों की कानूनी स्थिति को लेकर कम अस्पष्टता का सामना करना पड़ेगा।
किसी ऋण विवाद, बैंक खाते के लेनदेन, भुगतान संबंधी विवाद या वित्तीय धोखाधड़ी के मामले में बैंक के डिजिटल रिकॉर्ड महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं। यदि प्रमाणन और रिकॉर्ड की सत्यता से जुड़ी आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं, तो ऐसे रिकॉर्ड अदालत में पेश किए जा सकेंगे।
डिजिटल युग के अनुरूप कानूनी सुधार
इस कानून को व्यापक रूप से भारत के पुराने औपनिवेशिक कानूनों को आधुनिक बनाने की प्रक्रिया से भी जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार का कहना है कि 1891 का कानून अपने समय के लिए उपयोगी था, लेकिन वर्तमान बैंकिंग तकनीक के लिहाज से इसकी संरचना पुरानी हो चुकी थी। नया बिल किसी खास तकनीक को कानूनी मान्यता देने के बजाय रिकॉर्ड के स्वरूप को व्यापक रूप से परिभाषित करता है। इसका उद्देश्य भविष्य में आने वाली नई तकनीकों के लिए भी कानून को उपयोगी बनाए रखना है।
विपक्ष ने उठाए सवाल
बिल को लेकर संसद में राजनीतिक मतभेद भी देखने को मिले। लोकसभा में बिल के पारित होने के दौरान विपक्षी सांसदों के विरोध और हंगामे के बीच इसे मंजूरी दी गई थी। राज्यसभा में भी विपक्ष के कुछ सदस्यों ने प्रक्रिया और चर्चा को लेकर आपत्ति जताई। कुछ विशेषज्ञों और आलोचकों ने डिजिटल वित्तीय डेटा की सुरक्षा और उसके इस्तेमाल को लेकर भी चिंता व्यक्त की है। इसलिए आने वाले समय में कानून के तहत रिकॉर्ड की पहुंच, प्रमाणन और डेटा सुरक्षा से जुड़े नियम महत्वपूर्ण होंगे।
डेटा सुरक्षा भी महत्वपूर्ण मुद्दा
जब बैंकिंग रिकॉर्ड डिजिटल, क्लाउड या वर्चुअल सिस्टम में संग्रहीत होते हैं, तो डेटा की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। अदालत में डिजिटल रिकॉर्ड को स्वीकार करने के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा कि रिकॉर्ड में अनधिकृत बदलाव न हो और उसकी मूल विश्वसनीयता बनी रहे। नए कानून में रिकॉर्ड की अखंडता और अनधिकृत बदलाव की जांच से जुड़ी शर्तों का होना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
1891 से 2026 तक बैंकिंग में कितना बदलाव
जब 1891 का कानून बनाया गया था, तब बैंकिंग रिकॉर्ड का मतलब मुख्य रूप से कागजी बही-खाते थे। बैंक अधिकारी खातों की प्रविष्टियां दर्ज करते थे और अदालत में जरूरत पड़ने पर प्रमाणित कागजी रिकॉर्ड पेश किया जाता था।
आज स्थिति पूरी तरह अलग है।
एक ग्राहक अपने मोबाइल फोन से कुछ सेकंड में बैंक खाता खोल सकता है, पैसे भेज सकता है, भुगतान कर सकता है और डिजिटल स्टेटमेंट प्राप्त कर सकता है। लाखों-करोड़ों लेनदेन इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में दर्ज होते हैं। इस बदलाव के बीच 135 वर्ष पुराने कानून को बदलना बैंकिंग और न्यायिक व्यवस्था के बीच तालमेल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
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