पश्चिम बंगाल

TMC का पुराना प्रतीक जोड़ा फूल क्यों था इतना खास जानें पूरी कहानी

Ratna Netam
18 Sept 2026 3:16 PM IST
TMC का पुराना प्रतीक जोड़ा फूल क्यों था इतना खास जानें पूरी कहानी
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पश्चिम बंगाल : तृणमूल कांग्रेस (TMC) की पहचान रहे चुनाव चिन्ह ‘जोड़ा फूल’ की कहानी भी पार्टी के गठन और ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर से जुड़ी हुई है। यह केवल एक चुनाव चिन्ह नहीं था, बल्कि वर्षों तक पार्टी की विचारधारा और कार्यकर्ताओं की पहचान का प्रतीक बना रहा। करीब 28 साल तक ‘जोड़ा फूल’ ने टीएमसी को चुनावी मैदान में अलग पहचान दिलाई।तृणमूल कांग्रेस की स्थापना साल 1998 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर की थी। नई पार्टी के लिए एक अलग पहचान बनाना सबसे बड़ी चुनौती थी। इसी दौरान पार्टी के चुनाव चिन्ह को लेकर विचार शुरू हुआ और ममता बनर्जी ने खुद ‘जोड़ा फूल’ का डिजाइन तैयार किया।
कैसे बना ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिन्ह?
कहा जाता है कि ममता बनर्जी ने साधारण कागज पर दो फूलों का चित्र बनाकर पार्टी के चुनाव चिन्ह का विचार रखा था। दो फूलों के साथ घास का संकेत भी इसमें शामिल था, जो आम लोगों और जमीन से जुड़े आंदोलन की भावना को दर्शाने वाला बताया गया।चुनाव आयोग ने पार्टी को यह चुनाव चिन्ह आवंटित किया और इसके बाद ‘जोड़ा फूल’ तृणमूल कांग्रेस की स्थायी पहचान बन गया।
आम लोगों से जुड़ने का बनाया माध्यम
ममता बनर्जी की राजनीति हमेशा आम जनता से जुड़ाव और जनआंदोलनों के इर्द-गिर्द रही है। ‘जोड़ा फूल’ को भी पार्टी कार्यकर्ताओं ने इसी भावना से जोड़ा।ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक टीएमसी के समर्थकों के लिए यह चिन्ह पार्टी की पहचान बन गया। चुनाव प्रचार, पोस्टर, झंडे और प्रचार सामग्री में यह प्रमुख रूप से नजर आने लगा।
28 साल तक रहा टीएमसी का चेहरा
1998 में पार्टी के गठन के बाद से ‘जोड़ा फूल’ करीब 28 वर्षों तक टीएमसी की पहचान बना रहा। इस चुनाव चिन्ह के साथ पार्टी ने कई चुनाव लड़े और पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपनी मजबूत जगह बनाई।साल 2011 में टीएमसी ने पश्चिम बंगाल में लंबे समय से चली आ रही वाम मोर्चे की सरकार को हटाकर सत्ता हासिल की। इस जीत के दौरान भी ‘जोड़ा फूल’ पार्टी के चुनाव अभियान का प्रमुख हिस्सा था।
ममता बनर्जी और चुनाव चिन्ह का रिश्ता
ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर में ‘जोड़ा फूल’ का खास महत्व रहा है। पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए यह केवल चुनावी निशान नहीं बल्कि आंदोलन और संगठन की पहचान के रूप में देखा जाता रहा है।ममता बनर्जी ने कई मौकों पर पार्टी के संघर्ष और जनता से जुड़े मुद्दों का जिक्र करते हुए अपनी राजनीतिक यात्रा को याद किया है। इस दौरान पार्टी के चुनाव चिन्ह की भूमिका भी अहम रही।
चुनाव चिन्ह बदलने की चर्चा क्यों?
राजनीतिक दलों में चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद या बदलाव की स्थिति आमतौर पर तब आती है, जब पार्टी के अंदर विभाजन या अलग-अलग गुटों के दावे सामने आते हैं।चुनाव आयोग ऐसे मामलों में पार्टी के संविधान, संगठनात्मक समर्थन, दस्तावेज और अन्य तथ्यों के आधार पर फैसला करता है।
चुनाव चिन्ह की राजनीति में अहम भूमिका
भारत जैसे देश में चुनाव चिन्ह का महत्व काफी ज्यादा है। बड़ी संख्या में मतदाता पार्टी के नाम के साथ-साथ उसके चुनाव चिन्ह से भी पहचान बनाते हैं।खासकर ग्रामीण और कम पढ़े-लिखे मतदाताओं के बीच चुनाव चिन्ह राजनीतिक पहचान का बड़ा माध्यम रहा है। यही वजह है कि किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनाव चिन्ह का महत्व काफी अधिक होता है।
टीएमसी की पहचान से जुड़ी रही कहानी
‘जोड़ा फूल’ की कहानी केवल एक चुनाव चिन्ह की कहानी नहीं है, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के गठन, संघर्ष और विस्तार से जुड़ी यात्रा का हिस्सा रही है।ममता बनर्जी द्वारा तैयार किया गया यह प्रतीक वर्षों तक पार्टी के प्रचार और चुनावी राजनीति का केंद्र रहा। अब पार्टी की पहचान को लेकर सामने आए नए घटनाक्रम के बीच एक बार फिर ‘जोड़ा फूल’ चर्चा में है।
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