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बंगाल में 24 घंटे के भीतर दो एनकाउंटर से हड़कंप, रेप-मर्डर और BJP कार्यकर्ता की हत्या के आरोपी ढेर

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में पुलिस की कार्यशैली को लेकर नई राजनीतिक बहस छिड़ गई है। राज्य में लगभग 12 घंटे के अंतराल पर हुई दो पुलिस मुठभेड़ों में गंभीर आपराधिक मामलों के दो आरोपियों की मौत हो गई। पहली घटना उत्तर 24 परगना जिले के गायघाटा इलाके में हुई, जहां 17 वर्षीय छात्रा से कथित दुष्कर्म और हत्या के आरोपी प्रह्लाद दास को पुलिस ने गोली मार दी। दूसरी घटना मुर्शिदाबाद जिले में सामने आई, जहां भाजपा कार्यकर्ता सुजीत मंडल की हत्या के आरोपी सामाउन शेख की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो गई। दोनों घटनाओं में पुलिस का दावा है कि आरोपी अपराध स्थल पर घटनाक्रम दोहराने की प्रक्रिया के दौरान पुलिसकर्मियों के हथियार छीनकर भागने का प्रयास कर रहे थे। लगातार हुई इन घटनाओं के बाद पश्चिम बंगाल पुलिस की तुलना उत्तर प्रदेश की एनकाउंटर नीति से होने लगी है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार पुलिस की कार्रवाई का बचाव कर रही है, जबकि विपक्ष ने मुठभेड़ों की परिस्थितियों पर सवाल उठाए हैं।
17 वर्षीय छात्रा के दुष्कर्म और हत्या के आरोपी का एनकाउंटर
पहली घटना उत्तर 24 परगना जिले के गायघाटा थाना क्षेत्र में हुई। यहां 17 वर्षीय छात्रा की कथित दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई थी। छात्रा कक्षा 11 में पढ़ती थी।
जानकारी के अनुसार, शनिवार रात छात्रा अपने घर के पास एक सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने गई थी। इसके बाद वह अचानक लापता हो गई। रविवार को उसका शव घर के नजदीक से बरामद किया गया।
घटना के बाद इलाके में भारी आक्रोश फैल गया। पुलिस ने जांच शुरू करते हुए 23 वर्षीय प्रह्लाद दास को गिरफ्तार किया।
प्रह्लाद पर छात्रा से दुष्कर्म और हत्या करने का आरोप था। पुलिस मामले से जुड़े साक्ष्य जुटाने और घटनाक्रम की जानकारी प्राप्त करने में जुटी हुई थी।
पुलिस की रिवॉल्वर छीनकर तीन गोलियां चलाने का दावा
पुलिस के अनुसार, सोमवार, 26 अक्टूबर की देर रात आरोपी प्रह्लाद दास को अपराध स्थल पर घटनाक्रम दोहराने के लिए ले जाया गया था।
पुलिस का दावा है कि वापसी के दौरान आरोपी ने शौच जाने के लिए वाहन रुकवाया। इसी दौरान उसने एक सब-इंस्पेक्टर की सर्विस रिवॉल्वर छीन ली और पुलिसकर्मियों पर गोलियां चला दीं।
बताया गया कि आरोपी ने तीन राउंड फायरिंग की। इसके जवाब में पुलिस ने चार गोलियां चलाईं, जिनमें से कुछ आरोपी को लगीं।
घायल प्रह्लाद दास को अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
हालांकि, पुलिस की ओर से बताए गए घटनाक्रम की स्वतंत्र पुष्टि और मुठभेड़ की परिस्थितियों की जांच महत्वपूर्ण है।
दूसरी मुठभेड़ में भाजपा कार्यकर्ता की हत्या का आरोपी ढेर
गायघाटा की घटना के कुछ घंटे बाद मुर्शिदाबाद जिले के शमशेरगंज इलाके में भी पुलिस मुठभेड़ हुई।
इस घटना में भाजपा कार्यकर्ता सुजीत मंडल की हत्या के आरोपी सामाउन शेख की मौत हो गई। सुजीत मंडल की हत्या करीब दो महीने पहले हुई थी और मामले की जांच सीआईडी कर रही थी।
पुलिस के अनुसार, आरोपी को अपराध स्थल पर घटनाक्रम दोहराने के लिए ले जाया गया था। इसी दौरान उसने कथित तौर पर पुलिस अधिकारी का हथियार छीन लिया और फायरिंग कर दी।
जवाबी कार्रवाई में सामाउन शेख गोली लगने से घायल हो गया। उसे अस्पताल पहुंचाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।
दोनों घटनाओं में पुलिस द्वारा लगभग एक जैसी परिस्थितियां बताए जाने से मुठभेड़ों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने पुलिस को दी खुली छूट
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने राज्य में कानून-व्यवस्था मजबूत करने और महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने के लिए सख्त रुख अपनाया है।
उन्होंने पहले भी स्पष्ट किया था कि गंभीर अपराधों पर कार्रवाई करने के लिए पुलिस को किसी राजनीतिक अनुमति का इंतजार नहीं करना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने जुलाई में विधानसभा में कहा था कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों में पुलिस कानून के दायरे में रहकर आवश्यक कदम उठाए। सरकार अधिकारियों के साथ खड़ी रहेगी।
उन्होंने पुलिस के काम में राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होने देने और अपराध के मामलों में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने की बात भी कही है।
हालांकि, पुलिस को कार्रवाई की स्वतंत्रता देने का अर्थ कानून से बाहर जाकर किसी आरोपी को दंडित करने की अनुमति नहीं है।
यूपी पुलिस से क्यों होने लगी बंगाल की तुलना?
उत्तर प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों को लेकर लंबे समय से राजनीतिक और कानूनी बहस होती रही है। अब पश्चिम बंगाल में लगातार हुई घटनाओं के बाद वहां की पुलिस कार्यशैली की तुलना यूपी से की जा रही है।
दोनों राज्यों में सरकारें अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई को कानून-व्यवस्था मजबूत करने की नीति के रूप में प्रस्तुत करती रही हैं।
हालांकि, पुलिस मुठभेड़ तभी कानूनी रूप से उचित मानी जा सकती है, जब बल प्रयोग आवश्यक और परिस्थितियों के अनुरूप हो।
किसी आरोपी पर गंभीर अपराध का आरोप होने मात्र से उसे गोली मारने का अधिकार पुलिस को नहीं मिल जाता। प्रत्येक मुठभेड़ की परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
जुलाई में भी हुआ था ऐसा एनकाउंटर
पश्चिम बंगाल में यह पहली घटना नहीं है। जुलाई 2026 में दक्षिण 24 परगना जिले के बारुईपुर में एक नाबालिग बच्ची के दुष्कर्म और हत्या के आरोपी प्रभास मंडल की पुलिस गोलीबारी में मौत हुई थी।
उस मामले में भी पुलिस ने दावा किया था कि आरोपी ने अपराध स्थल पर ले जाए जाने के दौरान पुलिसकर्मी का हथियार छीनकर फायरिंग की थी।
इस तरह पिछले चार महीनों में तीन अलग-अलग मामलों में पुलिस ने लगभग एक जैसी परिस्थितियों का विवरण दिया है।
इन घटनाओं के बाद सवाल उठ रहे हैं कि हिरासत में मौजूद आरोपी बार-बार पुलिसकर्मियों के हथियार कैसे छीन पा रहे हैं।
विपक्ष ने उठाए सवाल, निष्पक्ष जांच की मांग
पश्चिम बंगाल में लगातार हुई मुठभेड़ों पर विपक्षी दलों ने सवाल उठाए हैं।
माकपा नेता मोहम्मद सलीम ने मुठभेड़ों के घटनाक्रम पर संदेह जताते हुए पुलिस के दावों की आलोचना की है।
वहीं, पीड़ित छात्रा के परिवार ने पुलिस कार्रवाई के बाद राहत की बात कही। दूसरी ओर मुठभेड़ में मारे गए प्रह्लाद दास के परिजनों ने सवाल उठाया कि पुलिस हिरासत में मौजूद आरोपी हथियार कैसे छीन सकता था।
इन अलग-अलग प्रतिक्रियाओं के बीच निष्पक्ष जांच की आवश्यकता और बढ़ गई है।
एनकाउंटर पर क्या कहता है कानून?
भारत में पुलिस मुठभेड़ों में हुई मौतों की जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने दिशानिर्देश निर्धारित किए हैं।
ऐसे मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने, स्वतंत्र जांच कराने, पोस्टमार्टम और संबंधित साक्ष्यों के संरक्षण जैसी प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी निर्धारित समय के भीतर मुठभेड़ में हुई मौत की सूचना देने की व्यवस्था है।
इन कानूनी प्रक्रियाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पुलिस की कार्रवाई वास्तविक आत्मरक्षा में हुई थी या उसमें कोई अनियमितता थी।
बंगाल में कानून-व्यवस्था पर नई राजनीतिक बहस
पश्चिम बंगाल में लगभग 12 घंटे के भीतर हुई दो मुठभेड़ों ने कानून-व्यवस्था को लेकर नई बहस शुरू कर दी है।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार अपराधों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का संदेश दे रही है। दूसरी ओर विपक्ष पुलिस की जवाबदेही और कार्रवाई की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अपराध पर नियंत्रण और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा दोनों ही पुलिस व्यवस्था की जिम्मेदारी हैं।
अब मुठभेड़ों की जांच से ही स्पष्ट होगा कि पुलिस की ओर से बताए गए घटनाक्रम और आत्मरक्षा के दावे किस हद तक सही हैं।





