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बंगाल निकाय चुनाव से पहले TMC के तीन गुटों में घमासान, ममता बनर्जी के सामने बड़ी चुनौती

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में नवंबर 2026 के अंतिम सप्ताह में प्रस्तावित नगर निकाय चुनावों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। कोलकाता नगर निगम (केएमसी) और हावड़ा नगर निगम (एचएमसी) के चुनाव से पहले राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति तैयार करना शुरू कर दिया है। इस बार मुकाबला इसलिए भी दिलचस्प होने जा रहा है, क्योंकि विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर हुआ विभाजन अब खुलकर सामने आ गया है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (एमएआईटीसी), रितब्रत बनर्जी से जुड़े डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस (डीटीसी) और तृणमूल के बागी सांसदों के नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल होने से राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं।
तीनों राजनीतिक धड़ों के बीच बयानबाजी और एक-दूसरे के प्रभाव वाले क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारने की तैयारियों ने चुनावी मुकाबले को नया मोड़ दे दिया है। दूसरी ओर, विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी भी नगर निगमों में अपनी पकड़ मजबूत करने की तैयारी में जुटी है।
विधानसभा चुनाव में हार के बाद बिखरी तृणमूल कांग्रेस
पश्चिम बंगाल में मई 2026 में हुए विधानसभा चुनाव ने राज्य की राजनीति की तस्वीर बदल दी थी। लगातार 15 वर्षों तक सत्ता में रहने वाली तृणमूल कांग्रेस को भाजपा के हाथों हार का सामना करना पड़ा।
भाजपा ने राज्य की 294 विधानसभा सीटों में से 208 पर जीत हासिल की, जबकि तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस को दो सीटें मिलीं और अन्य दलों ने शेष सीटों पर जीत दर्ज की।
विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में नेतृत्व और संगठन को लेकर मतभेद बढ़ गए। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट अलग राजनीतिक पहचान के साथ सक्रिय हुआ, जबकि रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व में डीटीसी का गठन हुआ।
इसके अतिरिक्त तृणमूल कांग्रेस के 20 लोकसभा सांसद एनसीपीआई में शामिल हो गए और इस दल ने राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए को समर्थन दिया।
अब निकाय चुनाव इन गुटों के राजनीतिक प्रभाव और जनसमर्थन की पहली बड़ी स्थानीय परीक्षा बन गए हैं।
ममता बनर्जी के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई
कोलकाता नगर निगम का चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कोलकाता लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस की राजनीति का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां पार्टी का मजबूत संगठन और स्थानीय नेताओं का व्यापक नेटवर्क मौजूद रहा है।
लेकिन विधानसभा चुनाव में हार और पार्टी के विभाजन के बाद परिस्थितियां बदल गई हैं। ममता बनर्जी के सामने अपने समर्थकों को एकजुट रखने और स्थानीय स्तर पर पार्टी के पुराने जनाधार को बचाने की चुनौती है।
रिपोर्टों के अनुसार, उम्मीदवार चयन में ममता बनर्जी के प्रति वफादार स्थानीय नेताओं को प्राथमिकता देने की तैयारी है।
इसके साथ ही पार्टी को यह भी देखना होगा कि संगठन छोड़कर दूसरे गुटों में शामिल हुए नेताओं के कारण किन वार्डों में उसका चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकता है।
डीटीसी में चुनावी गठबंधन को लेकर मतभेद
डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी निकाय चुनाव की रणनीति को लेकर मतभेद सामने आए हैं।
शुक्रवार को कोलकाता में आयोजित बैठक के दौरान पार्टी ने निकाय चुनाव में किसी दूसरे दल के साथ गठबंधन नहीं करने का निर्णय लिया। डीटीसी के अध्यक्ष अरूप रॉय ने स्पष्ट किया कि पार्टी स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।
हालांकि, कमरहाटी के विधायक मदन मित्रा ने इससे अलग राय व्यक्त की। उनका कहना है कि भाजपा को हराने के लिए ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट के साथ मिलकर चुनाव लड़ना अधिक प्रभावी हो सकता है।
मदन मित्रा ने चेतावनी दी कि अलग-अलग चुनाव लड़ने से विपक्षी वोटों का बंटवारा हो सकता है, जिसका फायदा भाजपा को मिलेगा। उन्होंने तृणमूल के विभिन्न गुटों से आपसी मतभेद दूर करने की अपील भी की।
एनसीपीआई और भाजपा के बीच गठबंधन पर संशय
तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों से जुड़े एनसीपीआई की भूमिका भी निकाय चुनाव में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए को समर्थन देने के बावजूद भाजपा ने पश्चिम बंगाल के निकाय चुनावों में एनसीपीआई के साथ गठबंधन करने से दूरी बनाई है।
प्रदेश भाजपा नेतृत्व का कहना है कि राष्ट्रीय स्तर पर किसी दल के साथ राजनीतिक संबंध होने का मतलब यह नहीं है कि स्थानीय चुनाव भी साथ लड़े जाएंगे।
भाजपा अपने संगठन और उम्मीदवारों की ताकत के आधार पर चुनाव लड़ना चाहती है। ऐसे में एनसीपीआई को भी अपनी चुनावी रणनीति अलग से तैयार करनी पड़ सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अगर सभी प्रमुख दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो कई वार्डों में बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिल सकता है।
कोलकाता में 209 और हावड़ा में 68 वार्डों पर नजर
राज्य में नगर निकाय चुनाव से पहले वार्डों की संख्या में भी बदलाव किया गया है।
अगस्त 2026 में पश्चिम बंगाल विधानसभा ने कोलकाता नगर निगम के वार्डों की संख्या 144 से बढ़ाकर 209 और हावड़ा नगर निगम के वार्डों की संख्या 50 से बढ़ाकर 68 करने संबंधी विधेयक पारित किए थे।
इसके चलते राजनीतिक दलों को नए वार्डों की स्थिति और मतदाता समीकरण के अनुसार उम्मीदवारों का चयन करना होगा।
हावड़ा नगर निगम में लंबे समय से चुनाव नहीं होने के कारण वहां का मुकाबला भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वर्ष 2018 में निर्वाचित बोर्ड का कार्यकाल समाप्त होने के बाद से वहां नई निर्वाचित परिषद का गठन नहीं हुआ है।
निकाय चुनाव होने से हावड़ा में स्थानीय प्रतिनिधित्व की नई व्यवस्था स्थापित होने का रास्ता खुलेगा।
नवंबर के अंतिम सप्ताह में मतदान की तैयारी
पश्चिम बंगाल राज्य निर्वाचन आयोग ने कोलकाता और हावड़ा सहित सात नगर निकायों में चुनाव कराने की तैयारियां तेज कर दी हैं।
इनमें कोलकाता, हावड़ा, बाली, हल्दिया, धूपगुड़ी, कालिम्पोंग और कर्सियांग शामिल हैं।
आयोग की प्रारंभिक योजना के अनुसार, 28 और 29 नवंबर के आसपास मतदान कराया जा सकता है, जबकि दो दिसंबर को मतगणना प्रस्तावित है।
चुनाव की औपचारिक अधिसूचना अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में जारी होने की संभावना जताई गई है। हालांकि, अंतिम तारीखों की पुष्टि आधिकारिक अधिसूचना जारी होने के बाद ही होगी।
इन निकायों में चुनाव के लिए करीब 6,301 मतदान केंद्रों की व्यवस्था करने की तैयारी है।
भाजपा के सामने भी बड़ी राजनीतिक परीक्षा
विधानसभा चुनाव में जीत के बाद भाजपा के लिए नगर निकाय चुनाव महत्वपूर्ण चुनौती साबित होंगे।
पार्टी अब विधानसभा स्तर की सफलता को स्थानीय निकायों तक पहुंचाना चाहती है। इसके लिए वार्ड स्तर पर संगठन मजबूत करने और स्थानीय मुद्दों को चुनावी अभियान में शामिल करने की तैयारी है।
नगर निकाय चुनाव में सड़क, पेयजल, जल निकासी, कचरा प्रबंधन, स्ट्रीट लाइट और नागरिक सुविधाओं जैसे मुद्दे प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।
भाजपा के सामने चुनौती होगी कि वह राज्य स्तर पर मिले जनसमर्थन को नगर निगमों में भी बरकरार रख सके।
ममता बनर्जी के राजनीतिक भविष्य के लिए अहम चुनाव
पश्चिम बंगाल के आगामी निकाय चुनावों को ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के विभिन्न गुटों के राजनीतिक भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है।
ममता बनर्जी के सामने अपनी पार्टी के पुराने समर्थकों को एकजुट करने की चुनौती है। वहीं, डीटीसी और एनसीपीआई के लिए यह चुनाव अपनी अलग राजनीतिक पहचान स्थापित करने का अवसर होगा।
यदि तृणमूल के विभिन्न गुट अलग-अलग उम्मीदवार उतारते हैं, तो कई वार्डों में उनके समर्थक मतदाताओं का बंटवारा हो सकता है। हालांकि, इसका वास्तविक चुनावी असर उम्मीदवारों की लोकप्रियता और स्थानीय समीकरणों पर निर्भर करेगा।
फिलहाल सभी दल औपचारिक चुनाव कार्यक्रम और उम्मीदवार चयन की तैयारियों में जुटे हैं। अब देखना होगा कि मतदान से पहले तृणमूल के विभिन्न गुटों के बीच कोई राजनीतिक समझौता होता है या सभी अपने-अपने दम पर चुनावी मैदान में उतरते हैं।





