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पश्चिम बंगाल: तृणमूल कांग्रेस का आंतरिक विवाद अब खुलकर कानूनी मोड़ ले चुका है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल तब तेज हो गई जब ममता बनर्जी गुट की राज्यसभा सांसद डोला सेन ने बागी गुट के नेताओं के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. यह शिकायत धोखाधड़ी, फर्जीवाड़ा और प्रतिरूपण जैसी गंभीर धाराओं में की गई है, जिसके बाद पार्टी के भीतर चल रहा संघर्ष अब सियासी मंच से निकलकर जांच एजेंसियों और पुलिस तक पहुंच गया है.
डोला सेन ने आरोप लगाया है कि बागी सांसदों ने त्रिपुरा की क्षेत्रीय पार्टी NCPI में तृणमूल कांग्रेस के कथित विलय को लेकर फर्जी दस्तावेजों और जाली हस्ताक्षरों का इस्तेमाल किया. उनके अनुसार यह पूरा दावा पूरी तरह से झूठा और मनगढ़ंत है, जिसका मकसद पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाना और जनता को भ्रमित करना है. डोला सेन ने यह भी कहा कि इन सांसदों ने चुनाव ममता बनर्जी के नाम, चेहरे और पार्टी के चुनाव चिन्ह पर जीता था, लेकिन संसद पहुंचने के बाद उन्होंने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ कदम उठाकर विश्वासघात किया है.
यह विवाद तब और बढ़ गया जब 20 बागी सांसदों के एक समूह ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस का विलय एनसीपीआई में किया जा रहा है और साथ ही उन्होंने संसद में एनडीए को समर्थन देने की बात भी कही. इस कदम के बाद पार्टी के भीतर भारी असंतोष फैल गया और ममता बनर्जी खेमे ने इसे संगठन के खिलाफ बड़ी साजिश बताया.
डोला सेन ने अपनी शिकायत में यह भी आरोप लगाया है कि इस पूरे मामले में तकनीकी हेरफेर और फर्जी प्रक्रियाओं का सहारा लिया गया, जो एक आपराधिक कृत्य है. उन्होंने मांग की है कि इस मामले की गहन जांच हो और दोषी पाए जाने पर सभी बागी सांसदों की सदस्यता रद्द की जाए.
इस घटनाक्रम के बाद बंगाल से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. अब सभी की नजर लोकसभा अध्यक्ष के फैसले पर टिकी है, क्योंकि इसी से तय होगा कि यह मामला सिर्फ पार्टी विवाद रहेगा या फिर कानूनी कार्रवाई और दल-बदल कानून के तहत बड़ी कार्रवाई का आधार बनेगा. राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आरोप साबित होते हैं तो बागी सांसदों की मुश्किलें काफी बढ़ सकती हैं और मामला संसद से लेकर अदालत तक पहुंच सकता है.





