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बंगाल में फिर बड़े दल-बदल की चर्चा, 17 सांसदों के भाजपा में जाने का दावा

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़े दल-बदल की अटकलें तेज हो गई हैं। तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए कूचबिहार के सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने दावा किया है कि NCPI से जुड़े 17 सांसद जल्द भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो सकते हैं। उनके इस बयान के बाद प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ गई है। हालांकि, संबंधित बागी गुट के कई नेताओं ने उनके दावे को खारिज करते हुए कहा है कि भाजपा में शामिल होने का कोई सामूहिक निर्णय नहीं लिया गया है।
बसुनिया का दावा है कि 17 सांसदों ने एक साथ भाजपा में जाने की योजना तैयार कर ली है। यह राजनीतिक घटनाक्रम दुर्गा पूजा से पहले या उसके आसपास सामने आ सकता है। उन्होंने दल-बदल विरोधी कानून का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि दो-तिहाई से अधिक सांसद सामूहिक रूप से कोई फैसला करते हैं तो उन पर अयोग्यता का प्रावधान लागू नहीं होगा। यह फिलहाल बसुनिया का दावा है और इस पर सक्षम संवैधानिक प्राधिकारी या अदालत की अंतिम व्यवस्था सामने नहीं आई है।
रिपोर्टों के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए 20 सांसदों ने जून में NCPI में विलय की घोषणा की थी। उन्होंने खुद को अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता देने की मांग भी रखी थी। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने इस घटनाक्रम को असंवैधानिक बताते हुए संबंधित सांसदों को अयोग्य ठहराने की मांग की है। मामले की कानूनी और संसदीय स्थिति पर अभी अंतिम फैसला होना बाकी बताया जा रहा है।
बसुनिया के बयान के बाद सांसद यूसुफ पठान, सायोनी घोष, अबू ताहेर खान और खलीलुर रहमान सहित कई नेताओं के अगले राजनीतिक कदम को लेकर अटकलें शुरू हो गईं। बसुनिया ने अपने दावे में उन 17 सांसदों के नामों की औपचारिक सूची सार्वजनिक नहीं की है, जो कथित रूप से भाजपा में जाने के लिए तैयार हैं। इसी कारण किसी विशेष सांसद के बारे में निश्चित तौर पर कुछ कहना संभव नहीं है।
बागी समूह में शामिल सांसद अबू ताहेर खान ने बसुनिया के बयान पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि बसुनिया को सभी सांसदों की ओर से बोलने का अधिकार नहीं है। खान ने अपने साथ यूसुफ पठान और खलीलुर रहमान का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि वे भाजपा या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल नहीं होने जा रहे। उन्होंने यह भी कहा कि विकास से जुड़े मुद्दों पर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की ओर से बुलाई जाने वाली सरकारी बैठकों में भाग लेना अलग विषय है, लेकिन इसे भाजपा या एनडीए में शामिल होने से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
सांसद शताब्दी रॉय ने भी कहा कि समूह ने भाजपा में जाने का कोई सामूहिक फैसला नहीं किया है। उनके मुताबिक बसुनिया ने यह बयान व्यक्तिगत हैसियत से दिया है। बागी नेताओं की अलग-अलग प्रतिक्रियाओं से यह संकेत अवश्य मिल रहा है कि समूह के भीतर भविष्य की राजनीतिक दिशा को लेकर एकमत स्थिति नहीं है। एक ओर बसुनिया 17 सांसदों के सामूहिक फैसले का दावा कर रहे हैं, जबकि दूसरी ओर समूह के नेता ऐसे किसी निर्णय से इनकार कर रहे हैं। इन परस्पर विरोधी बयानों का उल्लेख किया गया है।
भाजपा ने भी बसुनिया के दावे की पुष्टि नहीं की है। पश्चिम बंगाल भाजपा नेतृत्व ने कहा है कि पार्टी को ऐसे किसी प्रस्तावित सामूहिक प्रवेश की जानकारी नहीं है। भाजपा का कहना है कि केवल किसी नेता की पार्टी में शामिल होने की इच्छा जताने से उसका प्रवेश सुनिश्चित नहीं हो जाता। किसी भी नेता को संगठन में शामिल करने से पहले पार्टी अपने स्तर पर फैसला करती है। इस प्रतिक्रिया के बाद यह स्पष्ट है कि फिलहाल बसुनिया के दावे को भाजपा की आधिकारिक सहमति प्राप्त नहीं है।
तृणमूल कांग्रेस ने पूरे घटनाक्रम को अवसरवादी राजनीति करार दिया है। पार्टी प्रवक्ता कुणाल घोष ने आरोप लगाया कि बागी नेता भाजपा के एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि इन सांसदों ने तृणमूल के चुनाव चिह्न पर भाजपा विरोधी मतदाताओं का समर्थन हासिल किया था और अब वे उन्हीं मतदाताओं के जनादेश के विपरीत कदम उठा रहे हैं। तृणमूल की ओर से यह भी कहा गया कि सांसदों की सदस्यता से संबंधित मामला विचाराधीन है, इसलिए अंतिम निष्कर्ष कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू दल-बदल विरोधी कानून भी है। संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत किसी विधायी दल के सदस्यों के दल बदलने पर उन्हें अयोग्य ठहराया जा सकता है। विलय से संबंधित दो-तिहाई सदस्यों का प्रावधान मौजूद है, लेकिन किसी खास मामले में यह सुरक्षा लागू होगी या नहीं, इसका निर्णय परिस्थितियों, दस्तावेजों और सक्षम प्राधिकारी की व्यवस्था पर निर्भर करता है। इसलिए केवल संख्याबल का दावा कर देने से सांसदों की सदस्यता सुरक्षित होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
बसुनिया के बयान ने फिलहाल बंगाल की राजनीति में नई बहस अवश्य छेड़ दी है। यदि 17 सांसद सचमुच भाजपा में शामिल होते हैं तो इससे राज्य के राजनीतिक समीकरण और संसद में दलगत स्थिति प्रभावित हो सकती है। लेकिन बागी सांसदों तथा भाजपा की ओर से दावा खारिज किए जाने के बाद इसे अभी संभावित राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में ही देखा जाना चाहिए। स्थिति तभी स्पष्ट होगी, जब संबंधित सांसद सामूहिक रूप से कोई औपचारिक घोषणा करें या भाजपा उनके प्रवेश की पुष्टि करे।





