पश्चिम बंगाल

नंदीग्राम उपचुनाव पर बागी गुट का ममता को बड़ा प्रस्ताव

Kavita2
13 Sept 2026 12:28 PM IST
नंदीग्राम उपचुनाव पर बागी गुट का ममता को बड़ा प्रस्ताव
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कोलकाता। नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव को लेकर पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। ममता बनर्जी के इस सीट से चुनाव लड़ने की संभावनाओं के बीच तृणमूल कांग्रेस के बागी गुट ने बड़ा प्रस्ताव रखा है। गुट का कहना है कि अगर ममता बनर्जी नंदीग्राम से उम्मीदवार बनने का निर्णय लेती हैं तो वह उनके खिलाफ अपना उम्मीदवार नहीं उतारेगा। इस बयान को पार्टी के भीतर चल रहे विवाद के बीच सुलह की पेशकश के रूप में देखा जा रहा है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर अधिकार का विवाद पहले ही चुनाव आयोग पहुंच चुका है। पार्टी के अलग-अलग गुट संगठन और चुनावी पहचान को लेकर आमने-सामने हैं। अब नंदीग्राम उपचुनाव ने उनके बीच समझौते की संभावना के साथ एक नई राजनीतिक चुनौती भी पैदा कर दी है।

बागी गुट के नेता रिताब्रत बनर्जी ने शनिवार को नई दिल्ली में इस संबंध में बयान दिया। उन्होंने बताया कि नंदीग्राम उपचुनाव के लिए उनके गुट ने उम्मीदवार का चयन कर लिया है। यह फैसला सामूहिक रूप से किया गया है, लेकिन उम्मीदवार के नाम की औपचारिक घोषणा अभी नहीं की गई है।

इसी के साथ रिताब्रत बनर्जी ने ममता बनर्जी के सामने सुलह का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि अगर ममता बनर्जी स्वयं नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव लड़ती हैं तो उनका गुट अपना उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारेगा। इससे दोनों गुटों के बीच सीधी चुनावी टक्कर टल सकती है।

रिताब्रत ने कहा कि वे ममता बनर्जी को उनके अपने इलाके और मतदान केंद्र पर हारते हुए नहीं देखना चाहेंगे। उन्होंने ममता बनर्जी के चुनावी प्रदर्शन को लेकर टिप्पणी करते हुए दावा किया कि वह आम चुनावों में सफल नहीं होतीं, जबकि उपचुनावों में जीत दर्ज करती हैं। इस बयान के माध्यम से उन्होंने नंदीग्राम से उनकी संभावित उम्मीदवारी को समर्थन देने का संकेत दिया।

बागी नेता ने पिछले चुनावी मुकाबलों का उल्लेख करते हुए बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी के हाथों ममता बनर्जी की हार का दावा भी किया। उनके बयान के अनुसार अधिकारी ने नंदीग्राम में जीत हासिल की और इसके बाद प्रदेश की राजनीति में सत्ता परिवर्तन हुआ। ये बातें रिताब्रत बनर्जी के राजनीतिक दावों और बयान के रूप में सामने आई हैं।

नंदीग्राम का चुनावी मुकाबला पहले भी ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा है। ऐसे में एक बार फिर ममता बनर्जी के इसी सीट से चुनाव लड़ने की संभावना ने राजनीतिक दिलचस्पी बढ़ा दी है। यदि वह उम्मीदवार बनती हैं तो यह मुकाबला केवल एक विधानसभा सीट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पार्टी की आंतरिक राजनीति और नेतृत्व के प्रश्न से भी जुड़ जाएगा।

बागी गुट के प्रस्ताव में समर्थन और राजनीतिक दबाव दोनों दिखाई दे रहे हैं। एक ओर गुट ने ममता के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारने की बात कही है, वहीं दूसरी ओर उनके पिछले चुनावी प्रदर्शन को लेकर तीखी टिप्पणी भी की गई है। इसी कारण इस पेशकश को पूरी तरह समझौते का प्रस्ताव मानने के बजाय रणनीतिक राजनीतिक बयान के रूप में भी देखा जा रहा है।

रिताब्रत बनर्जी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि ममता बनर्जी के चुनाव नहीं लड़ने की स्थिति में बागी गुट किसे उम्मीदवार बनाएगा। उन्होंने केवल इतना कहा कि नाम का चयन सामूहिक रूप से किया जा चुका है। उम्मीदवार की घोषणा रोककर रखने के फैसले को ममता बनर्जी के अगले कदम के इंतजार से भी जोड़कर देखा जा रहा है।

अगर ममता बनर्जी नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का निर्णय करती हैं और बागी गुट अपना उम्मीदवार वापस रखता है तो पार्टी के दोनों पक्षों के बीच बातचीत का रास्ता खुल सकता है। इससे चुनाव चिह्न पर जारी विवाद के समाधान की संभावना भी बन सकती है। हालांकि अभी तक किसी औपचारिक समझौते या बातचीत की पुष्टि नहीं हुई है।

दूसरी ओर ममता बनर्जी के चुनाव नहीं लड़ने पर बागी गुट अपने चयनित उम्मीदवार की घोषणा कर सकता है। ऐसी स्थिति में नंदीग्राम का उपचुनाव टीएमसी के आंतरिक विभाजन का नया मैदान बन सकता है। इससे समर्थकों और पार्टी के स्थानीय संगठन के सामने भी किसी एक पक्ष को चुनने की चुनौती खड़ी होगी।

तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर अधिकार का विवाद इस राजनीतिक संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। चुनाव आयोग के सामने पहुंचे इस मामले का फैसला दोनों गुटों की चुनावी रणनीति को प्रभावित कर सकता है। पार्टी का आधिकारिक चुनाव चिह्न किस पक्ष को मिलेगा, इसका सीधा असर उम्मीदवारों की पहचान और समर्थकों के बीच संदेश पर पड़ेगा।

नंदीग्राम में बागी गुट की ओर से उम्मीदवार नहीं उतारने का प्रस्ताव केवल व्यक्तिगत सम्मान तक सीमित नहीं माना जा रहा। यह पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन बनाने और राजनीतिक नुकसान को रोकने की कोशिश भी हो सकती है। ममता बनर्जी की उम्मीदवारी के खिलाफ उम्मीदवार उतारने से बागी गुट को पार्टी के पारंपरिक समर्थकों की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है।

रिताब्रत बनर्जी के बयान में ममता बनर्जी के प्रति सम्मान और आलोचना दोनों नजर आए। उन्होंने एक ओर कहा कि वे ममता को अपने ही क्षेत्र और बूथ पर हारते नहीं देखना चाहते, वहीं दूसरी ओर आम चुनावों में उनकी जीत की क्षमता पर सवाल भी उठाया। इस मिश्रित संदेश ने उनके प्रस्ताव को और दिलचस्प बना दिया है।

फिलहाल ममता बनर्जी की ओर से नंदीग्राम उपचुनाव लड़ने के बारे में कोई अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं किया गया है। बागी गुट भी अपने उम्मीदवार का नाम घोषित करने से रुका हुआ है। ऐसे में आने वाले दिनों में ममता का फैसला पूरे राजनीतिक समीकरण की दिशा तय कर सकता है।

यदि ममता बनर्जी मैदान में उतरती हैं तो बागी गुट को अपने प्रस्ताव के अनुसार उम्मीदवार नहीं उतारने का निर्णय औपचारिक रूप से लेना होगा। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच संबंध सुधारने की कोशिशें तेज हो सकती हैं। अगर वह चुनाव नहीं लड़तीं तो गुटीय मुकाबला और तीखा होने की संभावना रहेगी।नंदीग्राम उपचुनाव अब एक सीट का सामान्य चुनाव नहीं रह गया है। यह ममता बनर्जी के राजनीतिक प्रभाव, बागी गुट की रणनीति और तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर जारी विवाद से जुड़ गया है। रिताब्रत बनर्जी की पेशकश ने फिलहाल सुलह का दरवाजा खोला है, लेकिन अंतिम तस्वीर ममता बनर्जी के फैसले और चुनाव आयोग की आगामी प्रक्रिया से ही स्पष्ट होगी।

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