पश्चिम बंगाल

सार्वजनिक शौचालयों: महिलाओं की आय का 10% खर्च, फिर भी सुविधाओं का अभाव

SHIDDHANT
3 Sept 2025 9:06 PM IST
सार्वजनिक शौचालयों: महिलाओं की आय का 10% खर्च, फिर भी सुविधाओं का अभाव
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KOLKATTA कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में किए गए एक अध्ययन ने सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबर इंस्टीट्यूट और आजाद फाउंडेशन द्वारा किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि यहां दो तिहाई से अधिक महिलाओं को सार्वजनिक शौचालयों का उपयोग करने के लिए अपनी दैनिक आय का लगभग 10% खर्च करना पड़ता है। इसके बावजूद उन्हें बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पातीं। अध्ययन के अनुसार, 61% महिलाओं ने बताया कि सार्वजनिक शौचालयों में साबुन या हाथ धोने की सुविधा नहीं होती। वहीं, 56% महिलाओं का कहना है कि शौचालयों के आसपास गंदगी बनी रहती है। इसके अलावा, आधे से ज्यादा ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों ने स्वीकार किया कि उन्हें शौचालयों में उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।
इस अध्ययन ने कोलकाता जैसे महानगर में बुनियादी स्वच्छता ढांचे की कमी को उजागर किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि शहर में परिवहन और कनेक्टिविटी का विस्तार तो हुआ है, लेकिन सार्वजनिक स्वच्छता की व्यवस्था उपेक्षित रही है। इसका असर खासतौर पर महिलाओं और ट्रांसजेंडर समुदाय पर असमान रूप से पड़ रहा है। अध्ययन में सामने आया कि महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा है। जो महिलाएं दैनिक मजदूरी करती हैं, उनके लिए आय का यह हिस्सा बड़ा बोझ बन जाता है। इसके अलावा, सुविधाओं की कमी और असुरक्षित माहौल उनके स्वास्थ्य और गरिमा पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है।
लोगों ने इस स्थिति पर अपनी नाराजगी भी जाहिर की है। उनका कहना है कि जब शहरी विकास की बात होती है, तो सड़कों और परिवहन को तरजीह दी जाती है, लेकिन शौचालय जैसी बुनियादी जरूरतों की अनदेखी कर दी जाती है। अध्ययन में सिफारिश की गई है कि शहर में सुरक्षित, स्वच्छ और समावेशी सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण और रखरखाव तत्काल किया जाए। रिपोर्ट के अनुसार, यह समस्या केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है बल्कि ट्रांसजेंडर समुदाय और अन्य हाशिए पर मौजूद वर्ग भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। सामाजिक संगठनों ने सरकार और नगर निकायों से अपील की है कि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि कोलकाता जैसे बड़े शहर में विकास का संतुलन तभी संभव है जब स्वच्छता और बुनियादी सुविधाओं को भी समान प्राथमिकता दी जाए।
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