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महालया से पहले दुर्गापूजा का उद्घाटन बंगाल की परंपरा के खिलाफ : भास्कर

हुगली: पश्चिम बंगाल सरकार में पीएचई और श्रम विभाग के राज्यमंत्री भास्कर भट्टाचार्य ने आरोप लगाया कि पिछली सरकार ने दुर्गापूजा को केवल उत्सव के रूप में पेश कर महालया से पहले पूजा पंडालों का उद्घाटन करके बंगाल की संस्कृति का उपहास किया है। शनिवार को साहित्यिक पत्रिका कवितार दिनरात के पूजा विशेषांक के विमोचन समारोह में उन्होंने यह बात कही। इस विशेषांक में मंत्री भास्कर भट्टाचार्य की पांच कविताएं प्रकाशित हुई हैं।
मंत्री ने कहा कि सनातन धर्म में दुर्गापूजा केवल उत्सव नहीं, बल्कि आराधना और उपासना का विषय है। पूजा और सामान्य उत्सव के बीच अंतर है, जिसे समझना जरूरी है। उन्होंने आरोप लगाया कि दूसरों को खुश करने की कोशिश में पिछली सरकार ने दुर्गापूजा की परंपरा और धार्मिक महत्व को कमतर किया।
भास्कर भट्टाचार्य ने कहा कि 34 वर्षों के वामपंथी शासनकाल में दुर्गापूजा को ‘शारदीय उत्सव’ के रूप में प्रस्तुत किया गया। वामपंथी विचारधारा पर सवाल उठाते हुए उन्होंने पूछा कि जो लोग, उनके आरोप के अनुसार, धर्म और धार्मिक महापुरुषों का उपहास करते हैं, वे पूजा पंडालों में कार्ल मार्क्स और लेनिन की विचारधारा से जुड़ी पुस्तकों के स्टॉल लगाने को लेकर उत्सुक क्यों हैं। उन्होंने कहा कि रूसी मार्क्सवादी विचारधारा का भारतीय संस्कृति की पारंपरिक विरासत से कोई सीधा संबंध नहीं है।
हालांकि, मंत्री ने स्पष्ट किया कि उन्हें पूजा पंडालों में वामपंथी पुस्तकों के स्टॉल लगाने पर कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा कि लोग स्वयं तय करेंगे कि वे रामकृष्ण परमहंस के आदर्शों का अनुसरण करना चाहते हैं या लेनिन की विचारधारा से प्रेरित होना चाहते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि श्रीरामपुर में लेनिन की प्रासंगिकता कितनी है और बंगाल के सामाजिक जीवन में रामकृष्ण परमहंस का महत्व कितना है, इसका फैसला भी जनता ही करेगी।
मंत्री के इस बयान से दुर्गापूजा के धार्मिक महत्व, वामपंथी विचारधारा और बंगाल की सांस्कृतिक विरासत को लेकर राजनीतिक एवं सांस्कृतिक बहस का मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है।





