पश्चिम बंगाल

नंदीग्राम से चुनाव नहीं लड़ेंगी ममता बनर्जी

Kavita2
14 Sept 2026 10:15 AM IST
नंदीग्राम से चुनाव नहीं लड़ेंगी ममता बनर्जी
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पश्चिम बंगाल : हाईप्रोफाइल नंदीग्राम विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस गुट ने अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी है। पार्टी ने इस महत्वपूर्ण सीट से संचिता प्रधान डे को चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया है। संचिता के नाम की घोषणा के साथ ही उन अटकलों पर विराम लग गया है, जिनमें दावा किया जा रहा था कि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद नंदीग्राम से उपचुनाव लड़ सकती हैं।

तृणमूल कांग्रेस ने नंदीग्राम के साथ रेजीनगर विधानसभा सीट के लिए भी उम्मीदवार घोषित किया है। रेजीनगर से रबीउल आलम चौधरी को प्रत्याशी बनाया गया है। इसके अलावा असम की नागांव लोकसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए पार्टी ने अब्दुल सलाम को उम्मीदवार घोषित किया है। इन घोषणाओं में सबसे अधिक चर्चा नंदीग्राम सीट की हो रही है, क्योंकि यह सीट लंबे समय से ममता बनर्जी और भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के बीच राजनीतिक संघर्ष का प्रमुख केंद्र रही है।

ममता बनर्जी के चुनाव मैदान में नहीं उतरने से लगभग 15 वर्षों में पहली बार उनके विधानसभा से बाहर रहने की स्थिति बन गई है। वर्ष 2011 में तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनने के बाद से ममता लगातार विधानसभा की सदस्य रही थीं। हालांकि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां पहले से काफी अलग हैं। विधानसभा चुनाव में हार और पार्टी के भीतर पैदा हुई गुटबाजी के बीच नंदीग्राम उपचुनाव को उनके लिए विधानसभा में वापसी का संभावित रास्ता माना जा रहा था। अब पार्टी ने संचिता प्रधान डे को टिकट देकर साफ कर दिया है कि ममता यह चुनाव नहीं लड़ेंगी।

नंदीग्राम विधानसभा सीट शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे के कारण खाली हुई है। विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों पर जीत हासिल की थी। बाद में उन्होंने भवानीपुर सीट को अपने पास रखते हुए नंदीग्राम से इस्तीफा दे दिया। इसी कारण यहां उपचुनाव कराया जा रहा है। नंदीग्राम में मतदान 6 अक्टूबर को प्रस्तावित है, जबकि मतगणना 9 अक्टूबर को होगी।

संचिता प्रधान डे स्थानीय राजनीति में सक्रिय रही हैं। तृणमूल कांग्रेस के ममता समर्थक गुट ने उन्हें उम्मीदवार बनाकर स्थानीय समीकरण साधने की कोशिश की है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि स्थानीय चेहरे को मैदान में उतारने से कार्यकर्ताओं को एकजुट करने और मतदाताओं से सीधे संपर्क बनाने में सहायता मिलेगी। हालांकि उनके सामने भाजपा के मजबूत संगठन के साथ तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी खींचतान से निपटने की भी बड़ी चुनौती होगी।

नंदीग्राम उपचुनाव ऐसे समय हो रहा है जब तृणमूल कांग्रेस दो गुटों में बंटी हुई नजर आ रही है। एक गुट ममता बनर्जी के नेतृत्व में काम कर रहा है, जबकि दूसरे गुट का नेतृत्व ऋतब्रत बनर्जी कर रहे हैं। दोनों पक्षों ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और ‘जोड़ा फूल’ चुनाव चिह्न पर अपना अधिकार जताया है। यह मामला चुनाव आयोग के सामने पहुंच चुका है। आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनी हैं और बागी गुट से अपने दावे के समर्थन में अतिरिक्त दस्तावेज मांगे हैं।

नामांकन प्रक्रिया के बीच चुनाव चिह्न का विवाद बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। चुनाव आयोग का फैसला तय करेगा कि आधिकारिक रूप से तृणमूल कांग्रेस का नाम और जोड़ा फूल चुनाव चिह्न किस गुट को मिलेगा। ममता समर्थक नेताओं ने गुटबाजी के दावों को खारिज करते हुए चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर भरोसा जताया है। दूसरी ओर ऋतब्रत बनर्जी गुट ने भी अपने दावे को मजबूत बताते हुए जरूरी दस्तावेज आयोग के सामने रखने की बात कही है।

बागी गुट ने इससे पहले ममता बनर्जी को नंदीग्राम से चुनाव लड़ने की चुनौती दी थी। गुट के प्रवक्ता रिजु दत्ता और विधायक मदन मित्रा ने कहा था कि यदि ममता खुद नंदीग्राम उपचुनाव लड़ती हैं तो उनका पक्ष उनके खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारेगा। इसके पीछे तर्क दिया गया था कि विपक्षी मतों का बंटवारा होने से भाजपा को लाभ मिल सकता है। अब संचिता प्रधान डे के उम्मीदवार बनने के बाद यह प्रस्ताव स्वतः अप्रासंगिक हो गया है।

कयास लगाए जा रहे हैं कि ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी गुट सोमवार को नंदीग्राम समेत दूसरी सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर सकता है। अगर बागी गुट नंदीग्राम में अलग प्रत्याशी उतारता है तो मुकाबला त्रिकोणीय या बहुकोणीय हो सकता है। इससे तृणमूल के पारंपरिक मतों में विभाजन की आशंका बढ़ जाएगी, जिसका राजनीतिक लाभ भाजपा को मिल सकता है। हालांकि बागी गुट की तरफ से उम्मीदवार के नाम की आधिकारिक घोषणा होने तक इस संभावना को अटकल के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

नंदीग्राम का राजनीतिक महत्व केवल एक विधानसभा सीट तक सीमित नहीं है। भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के कारण यही क्षेत्र ममता बनर्जी के राजनीतिक उत्थान का बड़ा आधार बना था। बाद में उनके करीबी रहे शुभेंदु अधिकारी भाजपा में शामिल हो गए और यह इलाका दोनों नेताओं की राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई का मैदान बन गया। इसीलिए प्रत्येक चुनाव में नंदीग्राम पर पूरे देश की नजर रहती है।

ममता बनर्जी के खुद चुनाव नहीं लड़ने के फैसले को अलग-अलग नजरिए से देखा जा रहा है। समर्थक इसे स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति बता रहे हैं, जबकि विरोधी इसे राजनीतिक जोखिम से बचने का कदम करार दे सकते हैं। अब संचिता प्रधान डे के सामने न केवल भाजपा को चुनौती देने, बल्कि तृणमूल के भीतर विभाजन से पैदा हुए असंतोष को नियंत्रित करने की भी जिम्मेदारी होगी।

उपचुनाव की तस्वीर बागी गुट और भाजपा के उम्मीदवार घोषित होने के बाद पूरी तरह साफ होगी। फिलहाल संचिता प्रधान डे की उम्मीदवारी ने यह तय कर दिया है कि नंदीग्राम में मुकाबला ममता बनर्जी की प्रत्यक्ष उम्मीदवारी के बजाय उनके नेतृत्व और राजनीतिक प्रभाव की परीक्षा बनेगा। चुनाव चिह्न से जुड़ा विवाद अभी चुनाव आयोग के विचाराधीन है।

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