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पश्चिम बंगाल
बक्सा में T138 की जंगल में एंट्री टाइगर रिलोकेशन प्रोजेक्ट को मिली बड़ी कामयाबी
Ratna Netam
5 Oct 2026 2:59 PM IST

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अलीपुरद्वार: पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व (BTR) में बाघों की आबादी को दोबारा बसाने की योजना ने एक अहम पड़ाव पार कर लिया है। राज्य के पहले टाइगर रिलोकेशन प्रोजेक्ट के तहत बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई तीन साल की बाघिन T138 रविवार शाम अपने ‘सॉफ्ट एनक्लोजर’ से बाहर निकलकर बक्सा टाइगर रिजर्व के जंगल में चली गई। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस घटनाक्रम को बाघ पुनर्वास कार्यक्रम की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है।
T138 को 2 अक्टूबर को बक्सा टाइगर रिजर्व में औपचारिक रूप से छोड़ा गया था। इसके बाद उसे एक सुरक्षित और नियंत्रित सॉफ्ट एनक्लोजर में रखा गया, ताकि नए वातावरण के साथ वह धीरे-धीरे खुद को ढाल सके। वन अधिकारियों की निगरानी में रहने के दौरान उसके व्यवहार, स्वास्थ्य और नए इलाके के प्रति प्रतिक्रिया पर नजर रखी जा रही थी। रविवार शाम बाघिन ने एनक्लोजर की घेराबंदी पार कर रिजर्व के प्राकृतिक वन क्षेत्र में प्रवेश किया। इसके साथ ही पुनर्वास परियोजना का अगला चरण शुरू हो गया।
T138 को बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में लाया गया है। यह स्थानांतरण वैज्ञानिक आकलन, स्वास्थ्य जांच और प्रबंधन से जुड़े मानकों को ध्यान में रखते हुए किया गया था। बाघिन को पहले शांत कर सुरक्षित तरीके से पकड़ा गया और फिर उसे बक्सा तक पहुंचाया गया। वहां पहुंचने के बाद पशु चिकित्सकों और वन अधिकारियों ने उसकी स्थिति की निगरानी की।
बक्सा टाइगर रिजर्व में बाघों की स्थायी आबादी को फिर से स्थापित करना लंबे समय से संरक्षण से जुड़ा लक्ष्य रहा है। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक बक्सा उत्तर बंगाल का ऐतिहासिक टाइगर लैंडस्केप है, लेकिन समय के साथ आवास में बदलाव, जंगलों के विखंडन और शिकार प्रजातियों की उपलब्धता में कमी जैसी परिस्थितियों ने यहां स्थायी बाघ आबादी को प्रभावित किया। हालांकि, आसपास के इलाकों से कभी-कभार बाघों की मौजूदगी दर्ज होती रही है।
इसी पृष्ठभूमि में बाघ पुनर्वास कार्यक्रम शुरू किया गया है। इसका उद्देश्य बक्सा के जंगलों में एक ऐसी बाघ आबादी विकसित करना है जो लंबे समय तक टिकाऊ हो और प्राकृतिक रूप से बढ़ सके। अधिकारियों और विशेषज्ञों की योजना चरणबद्ध तरीके से बाघों को यहां लाने और उनके अनुकूलन की निगरानी करने की है। T138 की रिहाई को इसी व्यापक कार्यक्रम की पहली बड़ी कार्रवाई के तौर पर देखा जा रहा है।
सॉफ्ट एनक्लोजर का इस्तेमाल ऐसे पुनर्वास कार्यक्रमों में जानवर को अचानक पूरी तरह खुले जंगल में छोड़ने से पहले संक्रमणकालीन चरण के रूप में किया जाता है। इस दौरान बाघिन को नए जंगल, मौसम, गंध और आसपास के वातावरण के साथ अभ्यस्त होने का मौका मिलता है। इसके बाद जब वह खुद से बाहर निकलती है, तो वन अधिकारी उसके मूवमेंट और व्यवहार को ट्रैक कर सकते हैं। T138 के जंगल में जाने के बाद उसकी गतिविधियों पर लगातार नजर रखना महत्वपूर्ण होगा
T138 की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार बाघिन को सैटेलाइट कॉलर लगाया गया है, जिसकी मदद से उसके मूवमेंट की जानकारी हासिल की जा सकेगी। इससे वन विभाग को यह समझने में मदद मिलेगी कि वह किस क्षेत्र में जा रही है, किस तरह का इलाका पसंद कर रही है और नए आवास में उसका व्यवहार कैसा है। ऐसी निगरानी पुनर्वास कार्यक्रम की सफलता का आकलन करने में महत्वपूर्ण होती है।
बक्सा में इस परियोजना के आगे भी बाघों को लाने की योजना है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक आने वाले समय में चरणबद्ध तरीके से अन्य बाघों को भी यहां लाने का प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य एक संतुलित और व्यवहार्य बाघ आबादी तैयार करना है, ताकि केवल एक या कुछ जानवरों की मौजूदगी तक संरक्षण प्रयास सीमित न रहें।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने इस परियोजना को वैज्ञानिक संरक्षण और स्थानीय समुदाय की भागीदारी से जोड़कर देखा है। आधिकारिक बयान में बक्सा में बाघों की वापसी को ऐतिहासिक संरक्षण प्रयास बताया गया है। मंत्रालय के अनुसार यह पहल बक्सा के पारिस्थितिक महत्व को मजबूत करने और उसके व्यापक वन्यजीव परिदृश्य को पुनर्जीवित करने की दिशा में उठाया गया कदम है।
बाघों की वापसी का असर केवल बाघों की संख्या तक सीमित नहीं होता। शीर्ष शिकारी के रूप में बाघ जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उसकी स्थायी मौजूदगी शिकार प्रजातियों, वन क्षेत्र और पूरे खाद्य तंत्र के संतुलन से जुड़ी होती है। इसलिए बक्सा में बाघों की आबादी फिर से स्थापित करने की कोशिश को व्यापक वन्यजीव संरक्षण के नजरिए से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
फिलहाल T138 के जंगल में सफलतापूर्वक प्रवेश के बाद वन अधिकारियों की प्राथमिकता उसकी सुरक्षित निगरानी और नए वातावरण में उसके व्यवहार का आकलन करना है। आने वाले दिनों में उसके मूवमेंट से यह पता चलेगा कि वह बक्सा के जंगल में किस तरह खुद को स्थापित करती है। इसके साथ ही इस परियोजना के अगले चरण में और बाघों को लाने की तैयारी पर भी नजर रहेगी।
कुल मिलाकर, तीन साल की बाघिन T138 का सॉफ्ट एनक्लोजर से निकलकर बक्सा टाइगर रिजर्व के जंगल में जाना पश्चिम बंगाल के पहले टाइगर रिलोकेशन प्रोजेक्ट के लिए अहम उपलब्धि है। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई इस बाघिन के जरिए बक्सा में बाघों की स्थायी आबादी बहाल करने की कोशिश को जमीन पर आगे बढ़ाया गया है। अब T138 की गतिविधियों और उसके अनुकूलन पर निगरानी इस संरक्षण परियोजना के अगले महत्वपूर्ण चरण को तय करेगी।
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