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पश्चिम बंगाल
वकील की भाषा पर हाई कोर्ट नाराज कहा पूरे भारत में हो रही चर्चा
Ratna Netam
12 Aug 2026 5:38 PM IST

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कोलकाता : कलकत्ता हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान एक वकील की ओर से कथित तौर पर आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किए जाने के मामले को गंभीरता से लेते हुए स्वतः संज्ञान लिया है। बुधवार को एक्टिंग चीफ जस्टिस तापब्रत चक्रवर्ती और जस्टिस अतारूप बनर्जी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए वकील के आचरण पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि न्यायिक कार्यवाही के दौरान इस तरह की भाषा का इस्तेमाल न केवल अदालत की गरिमा के खिलाफ है, बल्कि इससे पूरे संस्थान की प्रतिष्ठा भी प्रभावित होती है।
मामला 23 जुलाई को हुई एक सुनवाई से जुड़ा है। उस दौरान एक याचिका पर वकील फिरदौस समिम अदालत में पेश हुए थे। सुनवाई के दौरान संबंधित सिंगल जज की पीठ ने याचिका खारिज कर दी। आरोप है कि इसके बाद वकील ने कथित तौर पर आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। चूंकि उस समय अदालत की कार्यवाही का लाइव प्रसारण हो रहा था, इसलिए वकील की कथित टिप्पणी सार्वजनिक रूप से सामने आ गई।
मामले को गंभीरता से लेते हुए हाई कोर्ट ने 30 जुलाई को एक अन्य सुनवाई के दौरान इस घटना का स्वतः संज्ञान लिया था। अदालत ने वकील फिरदौस समिम को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा था कि उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही क्यों शुरू नहीं की जानी चाहिए। इसके बाद वकील की ओर से अपने व्यवहार के लिए माफी मांगी गई थी और भविष्य में ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं करने का आश्वासन दिया गया था।
हालांकि बुधवार की सुनवाई में खंडपीठ ने केवल माफी मांग लेने को पर्याप्त नहीं माना। अदालत ने वकील के पेशे और उनकी जिम्मेदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि एक वकील से अपेक्षा की जाती है कि वह अदालत के सामने सोच-समझकर अपनी बात रखे। पीठ ने सवाल उठाया कि यदि किसी याचिका के खारिज होने के बाद कोई अधिवक्ता न्यायिक पीठ के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करता है तो इसे सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि वकील कोई आम व्यक्ति नहीं है, बल्कि वह न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा है। इसलिए उसके व्यवहार का प्रभाव व्यापक होता है। पीठ ने चिंता जताई कि लाइव स्ट्रीमिंग के कारण अदालत में कही गई बातें तुरंत देशभर में पहुंच सकती हैं। इससे न्यायपालिका और हाई कोर्ट की प्रतिष्ठा पर असर पड़ सकता है।
सुनवाई के दौरान एक्टिंग चीफ जस्टिस की पीठ ने कहा कि पूरे भारत में यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि किसी हाई कोर्ट में वकील न्यायिक कार्यवाही के दौरान इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं और संस्था की ओर से कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाया जाता। अदालत ने इस घटना को न्यायिक मर्यादा और अनुशासन का गंभीर उल्लंघन बताया।
पीठ ने वकील की ओर से मांगी गई माफी पर भी सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि यदि कोई बात कोर्ट में बोलने योग्य नहीं है तो बाद में उसी बात के लिए माफी मांगना किस हद तक पर्याप्त माना जा सकता है। कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि कथित आपत्तिजनक टिप्पणी को केवल संबंधित एक जज के खिलाफ टिप्पणी के रूप में नहीं देखा जा सकता। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसी टिप्पणी का असर पूरी न्यायिक संस्था और सभी जजों की गरिमा पर पड़ सकता है।
कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि क्या केवल बिना शर्त माफी और भविष्य में ऐसी गलती नहीं दोहराने का भरोसा पर्याप्त होगा। पीठ ने कहा कि जानबूझकर और सोच-समझकर न्यायाधीशों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले व्यक्ति को सिर्फ माफी के आधार पर तुरंत राहत नहीं दी जा सकती। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आगे की कार्रवाई पर विचार करने की बात कही।
हालांकि, सुनवाई के अंत में कोर्ट ने वकील को एक अवसर दिया। पीठ ने निर्देश दिया कि वकील फिरदौस समिम संबंधित सिंगल जज के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर माफी मांगें। इसके साथ ही उन्हें लिखित रूप से यह भरोसा भी देना होगा कि भविष्य में इस तरह का व्यवहार दोबारा नहीं किया जाएगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि वकील की माफी और लिखित आश्वासन के बाद ही यह तय किया जाएगा कि उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही आगे बढ़ाई जाए या नहीं। इस तरह कोर्ट ने एक ओर न्यायिक गरिमा और अनुशासन को लेकर कड़ा रुख अपनाया, वहीं दूसरी ओर संबंधित अधिवक्ता को अपना पक्ष सुधारने का अवसर भी दिया है।
इस मामले ने अदालतों में लाइव स्ट्रीमिंग के दौर में वकीलों और अन्य पक्षकारों के आचरण को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। न्यायिक कार्यवाही की पारदर्शिता बढ़ने के साथ अदालत में कही गई प्रत्येक बात व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंच रही है। ऐसे में न्यायिक संस्थानों की गरिमा बनाए रखने के लिए वकीलों से जिम्मेदार और मर्यादित व्यवहार की अपेक्षा और भी महत्वपूर्ण हो गई है।
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