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कोलकाता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनाव को लेकर राजनीतिक चुनौतियां बढ़ती दिखाई दे रही हैं। खबर है कि नंदीग्राम में समर्थन हासिल करने के लिए ममता बनर्जी की ओर से कांग्रेस से संपर्क किया गया था, लेकिन कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। हालांकि, इस कथित बातचीत की तृणमूल कांग्रेस या कांग्रेस की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
कांग्रेस ने नंदीग्राम और रेजीनगर दोनों विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। पार्टी ने नंदीग्राम से मिलन प्रधान और रेजीनगर से मोहम्मद अब्दुल्लाहिल कफी को चुनावी मैदान में उतारा है। कांग्रेस के इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि पार्टी दोनों सीटों पर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत आजमाना चाहती है।
कांग्रेस की ओर से उम्मीदवार उतारे जाने के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को विपक्षी मतों के संभावित बंटवारे की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। यदि कांग्रेस और ममता बनर्जी का गुट अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो दोनों पक्षों के राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, चुनाव परिणाम पर इसका कितना असर पड़ेगा, यह स्थानीय मतदाताओं के रुख और अन्य उम्मीदवारों की स्थिति पर निर्भर करेगा।
नंदीग्राम सीट को लेकर पहले अटकलें लगाई जा रही थीं कि ममता बनर्जी स्वयं यहां से उपचुनाव लड़ सकती हैं। लेकिन उनके नेतृत्व वाले तृणमूल गुट ने इस सीट से संचिता प्रधान डे को उम्मीदवार घोषित कर दिया है। इसके साथ ही ममता बनर्जी के खुद चुनाव लड़ने की अटकलों पर फिलहाल विराम लग गया है। रेजीनगर से उनके गुट ने रबीउल आलम चौधरी को मैदान में उतारा है।
नंदीग्राम का चुनाव ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यहां कांग्रेस के अलावा वाम मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस के बागी गुट ने भी अपने उम्मीदवार उतारे हैं। कई उम्मीदवारों के मैदान में होने से मुकाबला बहुकोणीय बनने की संभावना है। इसका असर सभी प्रमुख दलों के चुनावी गणित पर पड़ सकता है।
मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ममता बनर्जी ने कांग्रेस से संपर्क कर नंदीग्राम उपचुनाव में सहायता मांगी थी। कांग्रेस ने कथित रूप से इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के बजाय अपना उम्मीदवार उतारने का फैसला किया। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि बातचीत सीधे ममता बनर्जी और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुई थी या दोनों दलों के किसी अन्य स्तर के नेताओं ने संपर्क किया था।
इस कथित बातचीत के संबंध में कोई पत्र, बैठक का विवरण या आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। इसलिए “ममता बनर्जी ने कांग्रेस से मदद मांगी” को पुष्ट तथ्य के बजाय मीडिया रिपोर्ट पर आधारित दावा मानना चाहिए। कांग्रेस ने प्रस्ताव किस कारण से अस्वीकार किया, इसकी भी आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
कांग्रेस का दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारना उसकी स्वतंत्र चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। पार्टी इन उपचुनावों के माध्यम से अपने संगठन और जनसमर्थन का आकलन करना चाहेगी। वहीं, उम्मीदवार वापस लेने या किसी अन्य दल को समर्थन देने के बजाय सीधे चुनाव लड़ने का फैसला स्थानीय कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने की रणनीति भी हो सकती है।
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट के सामने कांग्रेस के साथ तृणमूल के बागी नेताओं की चुनौती भी मौजूद है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, बागी गुट ने नंदीग्राम से मोहम्मद एतेशामुल हक और रेजीनगर से सफीउद्दीन शेख को उम्मीदवार बनाया है। इससे दोनों सीटों पर तृणमूल समर्थक मतदाताओं के सामने एक से अधिक विकल्प मौजूद हो सकते हैं।
नंदीग्राम और रेजीनगर के उपचुनाव के बीच तृणमूल कांग्रेस के अंदरूनी विवाद की भी चर्चा है। पार्टी के अलग-अलग गुटों के बीच चुनाव चिह्न और संगठन पर अधिकार को लेकर मामला निर्वाचन आयोग तक पहुंचा है। आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद बागी खेमे से अतिरिक्त दस्तावेज मांगे हैं।
ऐसे राजनीतिक माहौल में कांग्रेस का अलग उम्मीदवार उतारना ममता बनर्जी की मुश्किल बढ़ा सकता है। एक तरफ उन्हें विरोधी दलों का मुकाबला करना है, वहीं दूसरी तरफ अपने गुट के भीतर से निकले बागी नेताओं की चुनौती भी झेलनी पड़ रही है। इसके बावजूद किसी पार्टी की जीत या हार का दावा करना अभी जल्दबाजी होगा।
ममता बनर्जी के चुनाव लड़ने की चर्चा पर उम्मीदवारों की घोषणा के बाद स्थिति साफ हो गई है। नंदीग्राम से संचिता प्रधान डे और रेजीनगर से रबीउल आलम चौधरी को मैदान में उतारकर उनके गुट ने स्थानीय चेहरों पर भरोसा जताया है। वहीं, कांग्रेस के उम्मीदवारों की मौजूदगी ने किसी संभावित चुनावी समझौते की संभावना को फिलहाल समाप्त कर दिया है।
उपचुनाव में उम्मीदवारों की अंतिम स्थिति नामांकन वापसी की समयसीमा के बाद पूरी तरह स्पष्ट होगी। तब तक किसी दल के समर्थन, उम्मीदवार बदलने या चुनावी समझौते को लेकर नई राजनीतिक गतिविधियां भी हो सकती हैं। फिलहाल कांग्रेस और ममता बनर्जी का गुट अलग-अलग चुनाव लड़ते दिखाई दे रहे हैं।
नंदीग्राम उपचुनाव केवल एक विधानसभा सीट का मुकाबला नहीं रह गया है। यह कांग्रेस की स्वतंत्र रणनीति, ममता बनर्जी के गुट की चुनावी ताकत और तृणमूल के आंतरिक विवाद की भी परीक्षा बन सकता है। सभी पक्षों के उम्मीदवार मैदान में रहने पर मतों का बंटवारा चुनाव परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।





