पश्चिम बंगाल

ममता के बागियों पर BJP ने खींची लकीर

Ratna Netam
15 Sept 2026 2:43 PM IST
ममता के बागियों पर BJP ने खींची लकीर
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कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) से अलग हुए बागी सांसदों को लेकर नया सियासी घमासान खड़ा हो गया है। एक तरफ ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी गुट ने बागियों की वापसी के लिए दरवाजे बंद होने का संकेत दिया है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने भी सामूहिक रूप से इन नेताओं को पार्टी में शामिल करने के दावे से दूरी बना ली है। विवाद तब तेज हुआ जब कूचबिहार के सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने दावा किया कि टीएमसी छोड़कर दूसरी पार्टी में गए 20 सांसदों में से 17 जल्द भाजपा का दामन थाम सकते हैं। हालांकि भाजपा और कई दूसरे बागी सांसदों की प्रतिक्रिया ने इस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद टीएमसी में हुई राजनीतिक टूट से जुड़ा है। चुनाव में सत्ता परिवर्तन के बाद टीएमसी के कई सांसदों ने पार्टी से अलग रास्ता अपना लिया था। इनमें से 20 सांसद बाद में NCPI से जुड़े। अब इन्हीं सांसदों के राजनीतिक भविष्य को लेकर नई अटकलें शुरू हुई हैं।
17 सांसदों के भाजपा में जाने का दावा
कूचबिहार से सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने दावा किया है कि 20 बागी सांसदों में से 17 भाजपा में शामिल हो सकते हैं। उनके मुताबिक यह राजनीतिक बदलाव दुर्गा पूजा के आसपास हो सकता है।
बसुनिया ने यह भी दावा किया कि शुरुआत से ही कुछ नेताओं की योजना भाजपा में जाने की थी, लेकिन उस समय सभी सांसद इसके लिए तैयार नहीं थे। इसके चलते पहले NCPI का रास्ता चुना गया। अब उनका दावा है कि अधिकांश सांसद भाजपा में जाने के पक्ष में हैं।
रिपोर्टों के मुताबिक, बसुनिया ने तीन सांसदों—यूसुफ पठान, अबू ताहेर खान और खलीलुर रहमान—को छोड़कर बाकी 17 सांसदों के भाजपा में जाने की संभावना जताई है। हालांकि इसे अभी अंतिम या सामूहिक फैसला नहीं माना जा सकता।
दूसरे बागी सांसदों ने ही दावे पर उठाए सवाल
बसुनिया के दावे के बाद सबसे बड़ा सवाल तब खड़ा हुआ जब दूसरे सांसदों ने ही इससे दूरी बना ली। रिपोर्ट के मुताबिक शताब्दी रॉय और अबू ताहेर खान सहित कुछ नेताओं ने कहा कि उन्हें ऐसे किसी सामूहिक फैसले की जानकारी नहीं है।
NCPI की तरफ से भी इस बात को स्वीकार नहीं किया गया कि 17 सांसदों ने एक साथ भाजपा में शामिल होने का निर्णय ले लिया है। बसुनिया को सभी सांसदों की तरफ से बोलने का अधिकार होने की बात से भी इनकार किया गया है।
ऐसे में 17 सांसदों के भाजपा में जाने की खबर को फिलहाल **एक सांसद का दावा** ही माना जाना चाहिए। भाजपा या सभी संबंधित सांसदों की तरफ से इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
भाजपा ने क्या कहा?
इस पूरे घटनाक्रम में पश्चिम बंगाल भाजपा की प्रतिक्रिया सबसे अहम है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने बसुनिया के दावे को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने संकेत दिया कि भाजपा किसी को भी बिना सोच-विचार और पार्टी स्तर पर फैसला किए शामिल नहीं करती।
यह रुख भाजपा के पहले के बयान से भी मेल खाता है। जून में भट्टाचार्य ने टीएमसी से आने वाले नेताओं को लेकर कहा था कि भाजपा का 'तृणमूलीकरण' नहीं होने दिया जाएगा। उस समय उन्होंने टीएमसी विधायकों या नेताओं के बड़े पैमाने पर भाजपा में शामिल होने की अटकलों पर सख्त रुख अपनाया था।
यानी यह कहना कि भाजपा ने सभी 17 सांसदों को औपचारिक रूप से लेने से मना कर दिया है, अभी उपलब्ध जानकारी से पूरी तरह साबित नहीं होता। ज्यादा सटीक स्थिति यह है कि भाजपा ने 17 सांसदों के सामूहिक प्रवेश के दावे की पुष्टि नहीं की है और पार्टी नेतृत्व चयन के बाद ही किसी नेता की एंट्री पर फैसला करने की बात कर रहा है।
पहले तीन पूर्व सांसदों को भाजपा ने दी थी एंट्री
भाजपा का रुख सभी पूर्व टीएमसी नेताओं के लिए एक जैसा नहीं रहा है। जुलाई में टीएमसी के तीन पूर्व राज्यसभा सांसद—सुष्मिता देव, सुखेंदु शेखर रॉय और प्रकाश चिक बड़ाइक—भाजपा में शामिल हुए थे।
बाद में भाजपा ने पूर्व टीएमसी सांसदों को राज्यसभा उपचुनाव के लिए उम्मीदवार भी बनाया। इससे साफ है कि भाजपा ने टीएमसी छोड़ने वाले सभी नेताओं के लिए अपने दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं किए हैं। पार्टी की रणनीति चुनिंदा नेताओं को स्वीकार करने की दिखाई देती है।
इसलिए मौजूदा विवाद को 'टीएमसी के हर बागी के लिए भाजपा के दरवाजे बंद' के रूप में देखना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
ममता बनर्जी ने बागियों को दिया था सख्त संदेश
दूसरी तरफ ममता बनर्जी ने भी पार्टी छोड़ने या बगावत करने वाले नेताओं को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। हाल की एक रैली में उन्होंने बागी नेताओं पर निशाना साधते हुए संकेत दिया था कि पार्टी छोड़ने वालों के लिए वापसी आसान नहीं होगी। उन्होंने यहां तक कहा कि जो लोग जाना चाहते हैं, वे दिखावा करने के बजाय सीधे भाजपा में चले जाएं।
ममता के इस रुख को पार्टी के भीतर अनुशासन बनाए रखने और चुनावी हार के बाद संगठन को दोबारा मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
टीएमसी नेताओं ने मौजूदा विवाद में भी बागी सांसदों पर तीखा हमला किया है। पार्टी नेता कुणाल घोष ने बागियों को सिद्धांतहीन बताते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने न केवल पार्टी बल्कि उन मतदाताओं के भरोसे को भी तोड़ा है जिन्होंने भाजपा के खिलाफ मतदान किया था।
दलबदल कानून का भी सवाल
इस राजनीतिक खींचतान के बीच दलबदल विरोधी कानून भी चर्चा में है। बसुनिया का दावा है कि अगर दो-तिहाई सांसदों का समूह एक साथ फैसला करता है तो दलबदल कानून के तहत उनकी स्थिति अलग हो सकती है। हालांकि सांसदों की सदस्यता से जुड़ा मामला कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक टीएमसी संबंधित बागी सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग कर चुकी है और मामला न्यायिक प्रक्रिया में भी है। इसलिए किसी सांसद की सदस्यता बनी रहेगी या जाएगी, इसे राजनीतिक दावों के आधार पर तय मानना जल्दबाजी होगी।
क्या बागी सांसद बीच में फंस गए?
मौजूदा घटनाक्रम से यह सवाल जरूर उठ रहा है कि टीएमसी छोड़ने वाले सांसदों का अगला राजनीतिक ठिकाना क्या होगा। ममता बनर्जी का गुट उनकी वापसी को लेकर सख्त है, जबकि भाजपा भी बिना राजनीतिक और संगठनात्मक आकलन के सभी नेताओं को एक साथ शामिल करने के मूड में दिखाई नहीं दे रही।
बसुनिया की तरफ से 17 सांसदों के भाजपा में जाने का दावा बड़ा जरूर है, लेकिन अभी इसे अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। अन्य सांसदों ने इस दावे की पुष्टि नहीं की है और भाजपा ने भी सामूहिक प्रवेश पर मुहर नहीं लगाई है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि बंगाल में चुनाव के बाद शुरू हुई राजनीतिक उठापटक खत्म नहीं हुई है। टीएमसी से अलग हुए नेताओं को लेकर ममता बनर्जी और भाजपा दोनों अपनी-अपनी रणनीति के हिसाब से कदम उठा रहे हैं। आने वाले दिनों में दुर्गा पूजा से पहले या उसके बाद अगर वास्तव में कोई बड़ा दल-बदल होता है, तभी 17 सांसदों के भाजपा में जाने के दावे की असली तस्वीर साफ होगी।
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