पश्चिम बंगाल

बंगाल में 2021 से 2025 तक जारी जन्म प्रमाणपत्रों की होगी जांच

Kavita2
22 Aug 2026 5:31 PM IST
बंगाल में 2021 से 2025 तक जारी जन्म प्रमाणपत्रों की होगी जांच
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कोलकाता। पश्चिम बंगाल सरकार ने पिछले पांच वर्षों के दौरान जारी किए गए जन्म प्रमाणपत्रों की वैधता की जांच कराने का फैसला किया है। राज्य के मुख्य सचिव मनोज अग्रवाल ने जनवरी 2021 से दिसंबर 2025 तक ऑफलाइन अथवा ऑनलाइन माध्यम से जारी किए गए सभी जन्म प्रमाणपत्रों की जांच के निर्देश दिए हैं। सरकार का यह कदम जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में कथित बड़े पैमाने पर अनियमितताओं और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान सामने आए संदिग्ध दस्तावेजों के बाद उठाया गया है।

राज्य सचिवालय की ओर से बताया गया कि विभिन्न स्तरों पर जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र जारी करने में अनियमितताओं के प्रमाण मिले हैं। विशेष रूप से एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान कुछ ऐसे जन्म प्रमाणपत्र सामने आए, जिनकी वैधता और प्रामाणिकता को लेकर सवाल उठे। इसके बाद सरकार ने पिछले पांच वर्षों में जारी प्रमाणपत्रों की व्यापक स्तर पर जांच कराने का निर्णय लिया है।

पांच वर्षों के प्रमाणपत्र जांच के दायरे में

मुख्य सचिव की ओर से जारी निर्देश के अनुसार, जनवरी 2021 से दिसंबर 2025 के बीच जारी किए गए जन्म प्रमाणपत्रों की जांच की जाएगी। इसमें वे प्रमाणपत्र भी शामिल होंगे जो ऑनलाइन प्रक्रिया के माध्यम से जारी किए गए और वे भी जो ऑफलाइन तरीके से जारी किए गए थे।

इस जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में निर्धारित नियमों का पालन किया गया था या नहीं। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि संबंधित प्रमाणपत्रों में दर्ज जानकारी वास्तविक दस्तावेजों और सरकारी रिकॉर्ड से मेल खाती है या नहीं।

जन्म प्रमाणपत्र किसी व्यक्ति की पहचान और उम्र से जुड़ा महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेज होता है। इसका इस्तेमाल स्कूल में दाखिले, पासपोर्ट, सरकारी योजनाओं, नौकरी और विभिन्न कानूनी एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं में किया जाता है। इसलिए इसकी प्रामाणिकता को लेकर किसी भी तरह की गड़बड़ी गंभीर मामला मानी जाती है।

एसआईआर के दौरान सामने आए संदिग्ध प्रमाणपत्र

सरकार के इस फैसले की पृष्ठभूमि में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान सामने आए संदिग्ध जन्म प्रमाणपत्रों को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एसआईआर के दौरान मतदाताओं से जुड़े दस्तावेजों और विवरणों की जांच के क्रम में कुछ ऐसे रिकॉर्ड सामने आए, जिनकी सत्यता पर सवाल उठे।

इसके बाद संबंधित विभागों के स्तर पर जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत महसूस हुई। सरकारी अधिकारियों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का जन्म प्रमाणपत्र गलत जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है तो वह आगे चलकर कई सरकारी रिकॉर्ड में इस्तेमाल हो सकता है। इसलिए ऐसे दस्तावेजों की पहचान करना जरूरी है।

ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों रिकॉर्ड खंगाले जाएंगे

जांच केवल डिजिटल माध्यम से जारी किए गए प्रमाणपत्रों तक सीमित नहीं रहेगी। ऑफलाइन माध्यम से जारी किए गए जन्म प्रमाणपत्र भी जांच के दायरे में होंगे। इससे जांच का दायरा व्यापक हो गया है।

अधिकारियों को प्रमाणपत्रों के रिकॉर्ड, आवेदन प्रक्रिया और उपलब्ध दस्तावेजों का मिलान करने की जरूरत होगी। संबंधित स्थानीय निकायों और अन्य प्रशासनिक संस्थाओं के रिकॉर्ड भी जांच का हिस्सा बनाए जा सकते हैं।

ऑनलाइन व्यवस्था में दर्ज जानकारी और पुराने ऑफलाइन रिकॉर्ड के बीच भी आवश्यकतानुसार मिलान किया जाएगा। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किसी प्रमाणपत्र में दर्ज विवरण बाद में बदला गया है या किसी रिकॉर्ड को नियमों के विपरीत तैयार किया गया है।

अनियमितता मिलने पर हो सकती है कार्रवाई

जांच के दौरान यदि किसी जन्म प्रमाणपत्र में गंभीर अनियमितता या फर्जीवाड़ा पाया जाता है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। संबंधित प्रमाणपत्र की वैधता पर भी सवाल उठ सकते हैं और उसे रद्द करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

इसके अलावा यदि प्रमाणपत्र जारी करने वाले स्तर पर किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ विभागीय या कानूनी कार्रवाई की संभावना भी रहेगी। हालांकि, कार्रवाई से पहले रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जांच के आधार पर तथ्य स्पष्ट करना जरूरी होगा।

स्थानीय निकायों की भूमिका अहम

जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र जारी करने में स्थानीय प्रशासन और संबंधित निकायों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में पांच वर्षों के रिकॉर्ड की जांच के दौरान इन संस्थाओं से भी जानकारी जुटाई जाएगी।

प्रशासन के सामने यह चुनौती होगी कि बड़ी संख्या में जारी प्रमाणपत्रों की जांच करते समय वास्तविक और वैध दस्तावेज रखने वाले लोगों को अनावश्यक परेशानी न हो। जांच प्रक्रिया को स्पष्ट नियमों और रिकॉर्ड के आधार पर आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा।

सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर जोर

जन्म प्रमाणपत्रों की जांच का यह फैसला सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। किसी व्यक्ति के जन्म से संबंधित जानकारी सरकारी दस्तावेजों में दर्ज होने के बाद कई अन्य रिकॉर्ड से जुड़ जाती है। इसलिए शुरुआती स्तर पर ही रिकॉर्ड की शुद्धता सुनिश्चित करना जरूरी है।

सरकार की ओर से जांच का उद्देश्य केवल संदिग्ध प्रमाणपत्रों की पहचान करना ही नहीं, बल्कि प्रमाणपत्र जारी करने की पूरी व्यवस्था में मौजूद कमियों को सामने लाना भी हो सकता है। इससे भविष्य में फर्जी या गलत दस्तावेज जारी होने की संभावनाओं को कम करने के लिए नई व्यवस्था विकसित की जा सकती है।

एसआईआर के बाद प्रशासनिक स्तर पर बढ़ी सक्रियता

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान सामने आए संदिग्ध दस्तावेजों ने प्रशासनिक स्तर पर जन्म प्रमाणपत्रों की प्रामाणिकता को लेकर चिंता बढ़ाई है। इसी के बाद अब 2021 से 2025 के बीच जारी प्रमाणपत्रों को व्यापक जांच के दायरे में लाने का फैसला किया गया है।

फिलहाल मुख्य सचिव के निर्देश के बाद संबंधित विभागों और स्थानीय निकायों को रिकॉर्ड जुटाने तथा उनकी जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ानी होगी। जांच के परिणाम सामने आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि कितने प्रमाणपत्रों में अनियमितता पाई जाती है और उनके खिलाफ किस स्तर पर कार्रवाई की आवश्यकता होती है।

कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल सरकार का यह कदम जन्म प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। पांच वर्षों के ऑफलाइन और ऑनलाइन रिकॉर्ड की जांच से संदिग्ध प्रमाणपत्रों की पहचान और दस्तावेजी व्यवस्था में सुधार की दिशा में आगे की कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है।

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