पश्चिम बंगाल

बक्सा टाइगर रिजर्व पहुंचे भूपेंद्र यादव बाघिन छोड़ने से पहले देखीं तैयारियां

Ratna Netam
1 Oct 2026 9:33 PM IST
बक्सा टाइगर रिजर्व पहुंचे भूपेंद्र यादव बाघिन छोड़ने से पहले देखीं तैयारियां
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अलीपुरद्वार। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार जिले स्थित बक्सा टाइगर रिजर्व का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने जंगल सफारी के साथ उस क्षेत्र की तैयारियों का जायजा लिया, जहां बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई तीन साल की रॉयल बंगाल बाघिन को जंगल में छोड़ा जाना है। यह पहल पश्चिम बंगाल में अपनी तरह का पहला बाघ पुनर्वास कार्यक्रम है।
बाघिन को 30 सितंबर को बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से बक्सा लाया गया था। अधिकारियों के मुताबिक उसकी उम्र करीब तीन साल है। उसे सुरक्षित तरीके से बेहोश करने के बाद विशेष व्यवस्था के तहत उत्तर बंगाल पहुंचाया गया। बाघिन को हासीमारा एयर फोर्स स्टेशन तक विमान से लाया गया और वहां से विशेष वाहन के जरिए बक्सा टाइगर रिजर्व पहुंचाया गया।
बक्सा पहुंचने के बाद बाघिन को सीधे खुले जंगल में नहीं छोड़ा गया। पहले उसे एक विशेष सुरक्षित बाड़े में रखा गया है, जहां वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञ उसके स्वास्थ्य और व्यवहार पर नजर रख रहे हैं। अधिकारियों ने बताया कि बाघिन स्वस्थ है और सामान्य व्यवहार कर रही है। उसे रेडियो कॉलर लगाया गया है, ताकि जंगल में छोड़े जाने के बाद उसकी गतिविधियों और स्थान की लगातार निगरानी की जा सके।
भूपेंद्र यादव ने अपने दौरे के दौरान बाघिन को जंगल में छोड़े जाने से पहले की व्यवस्थाओं की समीक्षा की। उन्होंने संबंधित अधिकारियों से सुरक्षा, निगरानी, भोजन की उपलब्धता, जल स्रोत और पूरे क्षेत्र में किए गए प्रबंधन की जानकारी ली। बाघ पुनर्वास जैसी परियोजना में केवल जानवर को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसके लिए उपयुक्त प्राकृतिक परिस्थितियां तैयार करना भी जरूरी होता है।
बक्सा टाइगर रिजर्व में बाघों की आबादी को दोबारा स्थापित करने के प्रयास पिछले कई वर्षों से किए जा रहे हैं। वर्ष 2018 की बाघ गणना से जुड़ी रिपोर्ट में बक्सा उन अभयारण्यों में शामिल था, जहां बाघ दर्ज नहीं किए गए थे। इसके बाद यहां बाघों की वापसी के लिए शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ाने और प्राकृतिक आवास में सुधार पर काम शुरू किया गया।
इस योजना के तहत हिरण जैसे शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। अधिकारियों के अनुसार पिछले वर्षों में अलग-अलग स्थानों से करीब 870 चीतल बक्सा टाइगर रिजर्व में छोड़े गए, ताकि बाघों के लिए पर्याप्त प्राकृतिक शिकार उपलब्ध हो सके। इसके साथ ही जंगल में घास के मैदान विकसित करने, जल स्रोतों को सुरक्षित करने और मानवीय हस्तक्षेप कम करने की दिशा में भी काम किया गया।
बक्सा में लंबे समय से बाघों की स्थायी आबादी नहीं होने के कारण यह पुनर्वास परियोजना वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। दिसंबर 2021 में यहां लंबे अंतराल के बाद एक बाघ की मौजूदगी दर्ज की गई थी। हालांकि अब शुरू किया जा रहा कार्यक्रम योजनाबद्ध तरीके से बाघों की आबादी को दोबारा स्थापित करने का प्रयास है।
वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई बाघिन इस परियोजना का पहला चरण है। अधिकारियों की योजना आने वाले समय में अन्य बाघ और बाघिन भी बक्सा लाने की है। अगले दो वर्षों में कम से कम छह और बाघों को यहां लाने को लेकर विभिन्न राज्यों से बातचीत की जा रही है। इसका उद्देश्य बक्सा में एक स्थायी और स्वस्थ बाघ आबादी विकसित करना है।
बक्सा टाइगर रिजर्व भौगोलिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। यह भूटान के फिप्सू वन्यजीव अभयारण्य और पूर्व की ओर असम के मानस राष्ट्रीय उद्यान से जुड़े बड़े वन्यजीव परिदृश्य का हिस्सा है। इस क्षेत्र का इस्तेमाल बाघ और हाथी सहित कई जंगली जानवर प्राकृतिक आवागमन के गलियारे के रूप में करते हैं। ऐसे में यहां बाघों की वापसी पूरे वन्यजीव परिदृश्य के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
बाघिन को जंगल में छोड़े जाने की प्रक्रिया के दौरान किसी तरह की बाधा न आए, इसके लिए बक्सा टाइगर रिजर्व में पर्यटन गतिविधियों पर भी अस्थायी रोक लगाई गई है। 30 सितंबर से चार दिनों के लिए पर्यटन बंद रखने का फैसला लिया गया, ताकि वन विभाग की टीम पुनर्वास कार्यक्रम को नियंत्रित और सुरक्षित माहौल में पूरा कर सके।
केंद्र सरकार भी पिछले कुछ समय से बाघ पुनर्वास और सक्रिय वन्यजीव प्रबंधन पर जोर दे रही है। जून 2026 में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की ओर से आयोजित एक राष्ट्रीय कार्यशाला में वैज्ञानिक तरीके से बाघ पुनर्वास और उनके लिए उपयुक्त आवास तैयार करने की रणनीति पर चर्चा की गई थी।
अब सभी की नजर बक्सा टाइगर रिजर्व में इस परियोजना के अगले चरण पर है। बाघिन को जंगल में छोड़े जाने के बाद उसकी गतिविधियों की रेडियो कॉलर के माध्यम से लगातार निगरानी की जाएगी। उसके व्यवहार, शिकार की उपलब्धता और नए वातावरण में अनुकूलन से मिलने वाली जानकारी भविष्य में यहां लाए जाने वाले अन्य बाघों के पुनर्वास में भी अहम भूमिका निभाएगी।
पश्चिम बंगाल के लिए यह परियोजना इसलिए भी खास है क्योंकि इससे बक्सा में बाघों की स्थायी वापसी की उम्मीद जुड़ी है। यदि पहला चरण सफल रहता है तो आने वाले वर्षों में बक्सा टाइगर रिजर्व एक बार फिर नियमित बाघ आबादी वाले प्रमुख संरक्षित क्षेत्रों में शामिल हो सकता है।
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