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नंदीग्राम-रेजीनगर उपचुनाव के नतीजों पर नजर, नई भाजपा सरकार की पहली बड़ी चुनावी परीक्षा

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनाव के नतीजे बेहद अहम माने जा रहे हैं। 6 अक्टूबर को दोनों सीटों पर मतदान पूरा हो चुका है और मतगणना 9 अक्टूबर को होगी। यह चुनाव इसलिए खास है क्योंकि राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद पहली बार किसी बड़े चुनावी मुकाबले में मतदाताओं ने मतदान किया है। ऐसे में नतीजों को नई सरकार की शुरुआती राजनीतिक पकड़, विपक्ष की स्थिति और विभिन्न सामाजिक समूहों में भाजपा की स्वीकार्यता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
नंदीग्राम और रेजीनगर दोनों सीटों पर मतदान प्रतिशत काफी ऊंचा रहा। चुनाव आयोग से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक नंदीग्राम में करीब 80 प्रतिशत और रेजीनगर में भी लगभग 80 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। भारी मतदान के कारण राजनीतिक दल अब अपने-अपने पक्ष में अलग-अलग दावे कर रहे हैं। हालांकि असली तस्वीर मतगणना के बाद ही साफ होगी।
नंदीग्राम सीट मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के लिए विशेष राजनीतिक महत्व रखती है। 2026 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों से चुनाव लड़ा था। बाद में उन्होंने भवानीपुर सीट अपने पास रखने का फैसला किया, जिसके कारण नंदीग्राम में उपचुनाव कराना पड़ा। भाजपा ने यहां हसीरानी रथ को उम्मीदवार बनाया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने चुनाव प्रचार के दौरान इस सीट पर भाजपा की जीत का दावा किया और मतदान के दिन भी नंदीग्राम में सक्रिय नजर आए।
दूसरी ओर, विपक्ष ने नंदीग्राम में भाजपा को चुनौती देने के लिए अलग रणनीति अपनाई। कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को तृणमूल कांग्रेस ने समर्थन दिया। इससे विपक्षी वोटों को एकजुट करने की कोशिश दिखाई दी। हालांकि स्थानीय स्तर पर विपक्षी दलों के बीच तालमेल कितना प्रभावी रहा, इसका आकलन चुनाव नतीजों के बाद ही संभव होगा।
रेजीनगर की तस्वीर नंदीग्राम से अलग है। यह सीट मुस्लिम बहुल मानी जाती है और यहां भाजपा के लिए अपनी परंपरागत सीमाओं से बाहर समर्थन जुटाना एक बड़ी राजनीतिक चुनौती है। रेजीनगर सीट हुमायूं कबीर द्वारा खाली किए जाने के बाद उपचुनाव हुआ। चुनाव में भाजपा, तृणमूल और आम जनता उन्नयन पार्टी समेत कई दल मैदान में हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने प्रचार के दौरान अल्पसंख्यक मतदाताओं से भाजपा के पक्ष में मतदान करने की अपील की और विकास योजनाओं का मुद्दा उठाया।
मतदान के दिन रेजीनगर में तनाव भी देखने को मिला। आम जनता उन्नयन पार्टी के प्रमुख हुमायूं कबीर को पुलिस ने हिरासत में लिया। कबीर ने पुलिस पर चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप का आरोप लगाया, जबकि प्रशासन की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कही गई। विपक्षी दलों ने नंदीग्राम और रेजीनगर दोनों जगह मतदान प्रक्रिया को लेकर शिकायतें भी कीं और कुछ स्थानों पर पुनर्मतदान की मांग उठाई। भाजपा ने इन आरोपों को खारिज किया।
इन उपचुनावों को नई भाजपा सरकार की पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने हाल ही में कई महत्वपूर्ण नीतिगत घोषणाएं की हैं। उन्होंने कहा है कि उनकी सरकार छह महीने के भीतर समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने की दिशा में काम करेगी। इसके साथ ही उन्होंने उन मामलों से निपटने के लिए कानून लाने की बात कही है जिन्हें भाजपा “लव जिहाद” और “लैंड जिहाद” कहती है। ये शब्द राजनीतिक रूप से विवादित हैं और अलग-अलग दल इनके अर्थ तथा इस्तेमाल को लेकर असहमति रखते हैं।
ऐसे समय में उपचुनाव के नतीजे यह संकेत दे सकते हैं कि सरकार की शुरुआती नीतियों और राजनीतिक संदेशों को मतदाताओं ने किस तरह लिया है। हालांकि दो विधानसभा क्षेत्रों के परिणामों को पूरे राज्य की जनभावना का अंतिम पैमाना नहीं माना जा सकता। फिर भी भाजपा के सत्ता में आने के बाद यह पहला महत्वपूर्ण मतदान है, इसलिए परिणाम का राजनीतिक महत्व सामान्य उपचुनाव से कहीं अधिक है।
नंदीग्राम में भाजपा की चुनौती अपनी पकड़ बनाए रखने की है। यह क्षेत्र लंबे समय से बंगाल की राजनीति में प्रतीकात्मक महत्व रखता है। भूमि आंदोलन के दौर से लेकर हाल के विधानसभा चुनावों तक नंदीग्राम राजनीतिक सत्ता परिवर्तन की कहानी के केंद्र में रहा है। इस बार यहां मतदाता भाजपा उम्मीदवार को कितना समर्थन देते हैं, इससे मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की व्यक्तिगत राजनीतिक पकड़ का भी कुछ संकेत मिल सकता है।
रेजीनगर में भाजपा के सामने अलग तरह की परीक्षा है। यहां अल्पसंख्यक मतदाता बड़ी संख्या में हैं और विपक्ष कई हिस्सों में बंटा हुआ है। यदि भाजपा बेहतर प्रदर्शन करती है तो पार्टी इसे अपने सामाजिक विस्तार के संकेत के रूप में पेश कर सकती है। दूसरी ओर विपक्ष यदि सीट बचाने या भाजपा को कड़ी चुनौती देने में सफल रहता है तो वह इसे नई सरकार के खिलाफ राजनीतिक संदेश के रूप में बताएगा।
इन दोनों सीटों के नतीजों से विपक्ष की स्थिति भी स्पष्ट होगी। पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल अपने संगठन और रणनीति को फिर से व्यवस्थित करने की कोशिश कर रहे हैं। नंदीग्राम में कांग्रेस और तृणमूल के बीच समर्थन का प्रयोग और रेजीनगर में बहुकोणीय मुकाबला यह बताएगा कि विपक्षी मतों का बिखराव कितना असर डाल रहा है।
फिलहाल सभी की नजर 9 अक्टूबर की मतगणना पर है। नंदीग्राम में भाजपा अपनी पुरानी राजनीतिक पकड़ बरकरार रखने की कोशिश में है, जबकि रेजीनगर में पार्टी नए सामाजिक आधार तक पहुंचने की परीक्षा दे रही है। विपक्ष इन दोनों सीटों को भाजपा सरकार के शुरुआती राजनीतिक प्रभाव को चुनौती देने के अवसर के रूप में देख रहा है।
इसलिए नंदीग्राम और रेजीनगर के परिणाम केवल दो विधानसभा सीटों की जीत-हार तक सीमित नहीं रहेंगे। वे यह भी बताएंगे कि सत्ता परिवर्तन के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ रही है, भाजपा की नई सरकार का शुरुआती प्रभाव कितना है और विपक्ष किस हद तक एकजुट होकर मुकाबला करने की स्थिति में है।





