पश्चिम बंगाल

बंगाल में AJUP की दो सीटों पर जीत

Kavita2
5 May 2026 10:37 AM IST
बंगाल में AJUP की दो सीटों पर जीत
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Kolkata कोलकाता : पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राज्य की राजनीति में एक नया मोड़ देखने को मिला है। आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के संस्थापक और पूर्व तृणमूल कांग्रेस (TMC) विधायक हुमायूं कबीर ने नौदा और रेजिनगर दोनों विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की है। उनकी यह जीत राज्य की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों को दर्शाती है।

हुमायूं कबीर पहले तृणमूल कांग्रेस के विधायक थे, लेकिन बाद में उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया गया था। उनका विवाद तब शुरू हुआ जब उन्होंने अयोध्या में 1992 में ढहाई गई बाबरी मस्जिद की प्रतिकृति बनाने का कार्य शुरू किया और उसकी नींव रखी। इस कदम के बाद पार्टी के भीतर विवाद बढ़ा और अंततः उन्हें TMC से बाहर कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने अपनी नई राजनीतिक पार्टी AJUP की स्थापना की।

AJUP ने राजनीतिक रूप से मजबूत स्थिति बनाने के लिए असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के साथ गठबंधन की घोषणा की थी। शुरुआती चरण में यह गठबंधन राज्य में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा था।

हालांकि, बाद में AIMIM ने AJUP से अपने संबंध तोड़ लिए। यह निर्णय तब लिया गया जब तृणमूल कांग्रेस ने एक वीडियो सार्वजनिक किया, जिसमें कथित तौर पर हुमायूं कबीर यह स्वीकार करते हुए दिखाई दिए कि उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ एक समझौता किया था। इस कथित समझौते के तहत वह उन क्षेत्रों में TMC के वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रहे थे, जहां मुस्लिम आबादी अधिक है।

इस विवाद के बाद राजनीतिक माहौल और भी गर्म हो गया और AJUP को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए। इसके बावजूद हुमायूं कबीर ने अपने दम पर चुनावी मैदान में उतरते हुए नौदा और रेजिनगर सीटों पर जीत हासिल की।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि AJUP की यह जीत राज्य की राजनीति में नए समीकरणों की ओर इशारा करती है। यह परिणाम यह भी दर्शाता है कि क्षेत्रीय स्तर पर नई पार्टियां और नेता पारंपरिक राजनीतिक दलों के वोट बैंक को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

वहीं, TMC और अन्य प्रमुख दलों के लिए यह परिणाम एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि कुछ क्षेत्रों में स्थानीय मुद्दे और नेतृत्व की भूमिका निर्णायक साबित हो सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जहां चुनाव से पहले ही राजनीतिक गठजोड़, आरोप और रणनीतियों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है।

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