पश्चिम बंगाल

आधार, वोटर कार्ड और पैन से नहीं साबित होती नागरिकता: हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

Saba Naaz
29 July 2026 6:26 PM IST
आधार, वोटर कार्ड और पैन से नहीं साबित होती नागरिकता: हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
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कोलकाता। कलकत्ता हाई कोर्ट ने भारतीय नागरिकता को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड, वोटर आईडी, पैन कार्ड और बैंक खाता भारतीय नागरिकता का निर्णायक या अचूक प्रमाण नहीं माने जा सकते। अदालत ने कहा कि इन दस्तावेजों के होने मात्र से किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिक नहीं माना जा सकता, क्योंकि नागरिकता का निर्धारण कानूनी प्रक्रिया के तहत ही किया जाता है।

हाई कोर्ट की यह टिप्पणी मुर्शिदाबाद निवासी एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आई। संबंधित व्यक्ति को दस्तावेजों और बयानों में कथित विसंगतियों के आधार पर बांग्लादेशी नागरिक माना गया था और उसे डिटेंशन सेंटर में रखा गया था। व्यक्ति ने अदालत में अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कई दस्तावेज पेश किए थे, जिनमें वोटर कार्ड, आधार कार्ड, पैन कार्ड और बैंक खाते की जानकारी शामिल थी।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति देबांग्शु बासक और न्यायमूर्ति मोहम्मद शब्बर रशीदी की खंडपीठ ने की। अदालत ने कहा कि वोटर आईडी कार्ड केवल यह दर्शाता है कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में दर्ज है, लेकिन यह अपने आप में भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं है। इसी तरह आधार कार्ड पहचान और निवास से जुड़ा दस्तावेज है, जबकि पैन कार्ड वित्तीय गतिविधियों के लिए जारी किया जाता है। बैंक खाता भी किसी व्यक्ति की नागरिकता को प्रमाणित नहीं करता।

अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर सवाल उठता है तो उसे कानूनी रूप से निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपनी नागरिकता साबित करनी होगी। केवल सामान्य पहचान दस्तावेजों के आधार पर नागरिकता का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

यह मामला नासिर नामक व्यक्ति से जुड़ा था, जिसने खुद को भारतीय नागरिक बताया था। याचिका में उसके चचेरे भाई सुमन मोल्ला ने दावा किया था कि नासिर के पिता की मृत्यु वर्ष 1980 में हो गई थी और उसने ही नासिर का पालन-पोषण किया है। हालांकि, अदालत ने इस दावे में कई विरोधाभास पाए।

अदालत ने बताया कि दस्तावेजों के अनुसार नासिर की उम्र 46 वर्ष थी, जबकि सुमन मोल्ला की उम्र 38 वर्ष थी। ऐसे में सुमन द्वारा नासिर के बचपन से पालन-पोषण करने का दावा संदेह के घेरे में आया। इसके अलावा पुलिस पूछताछ और अदालत में दिए गए बयानों में भी अंतर पाया गया। पुलिस के सामने सुमन ने खुद को नासिर का चचेरा भाई बताया था, जबकि अदालत में उसने खुद को उसका चाचा बताया।

हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी संबंधित व्यक्ति की होती है। अदालत ने माना कि दस्तावेजों और बयानों में मौजूद विरोधाभासों को देखते हुए केवल पहचान पत्रों के आधार पर नागरिकता का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि हिरासत में नासिर ने कथित तौर पर खुद को बांग्लादेशी नागरिक बताया था। हालांकि हाई कोर्ट ने इस बयान की वैधता पर विस्तार से चर्चा नहीं की, लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि अन्य सबूतों के आधार पर भी नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी याचिकाकर्ता की ही थी।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि नासिर अपने पक्ष में जन्म प्रमाण पत्र जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज पेश नहीं कर सका। वहीं, उसके परिजनों की ओर से दिए गए दावों की पुष्टि भी पर्याप्त रूप से नहीं हो पाई।

एसआईआर प्रक्रिया के दौरान नासिर का नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का भी उल्लेख किया गया। अदालत ने कहा कि मतदाता सूची में नाम होना नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है और इसी तरह आधार, पैन कार्ड या बैंक खाता भी नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

कलकत्ता हाई कोर्ट के इस फैसले ने नागरिकता से जुड़े मामलों में दस्तावेजों की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट की है। अदालत ने दोहराया कि नागरिकता एक कानूनी दर्जा है, जिसे निर्धारित नियमों और प्रमाणों के आधार पर ही तय किया जा सकता है।

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