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वैज्ञानिकों ने बताई गहराई और चौड़ाई
देहरादून: उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित संवेदनशील हिमनद झील वसुंधरा ताल की गहराई 38.50 मीटर है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इसकी चौड़ाई लगभग 600 मीटर और लंबाई 900 मीटर है। करीब 15 हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित इस झील में प्रदेश का पहला सेंसर आधारित ग्लेशियर झील अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित कर दिया गया है। इससे झील के जलस्तर, मौसम, बर्फ और आसपास की भू-गतिविधियों की निगरानी की जा सकेगी। वैज्ञानिक दल ने बताया कि पुराने आँकड़ों की तुलना में झील के आकार में कोई विशेष बदलाव नहीं मिला है।
इस प्रणाली को केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, सीबीआरआई रुड़की ने विकसित किया है। इसे लगाने के लिए सीबीआरआई और वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों तथा तकनीकी विशेषज्ञों का दल 29 सितंबर को रवाना किया गया था। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने टीम को अभियान पर भेजा था। कार्य पूरा करके लौटे दल ने मंगलवार को उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण में सिस्टम की स्थापना और निगरानी की प्रक्रिया की जानकारी साझा की। आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन और सीबीआरआई के निदेशक प्रोफेसर आर. प्रदीप कुमार ने दल का स्वागत किया।
वसुंधरा ताल उत्तराखंड की उन हिमनद झीलों में शामिल है, जिनकी निगरानी संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लोफ के जोखिम को देखते हुए महत्वपूर्ण मानी गई है। राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार, राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र के वर्ष 2023 के आँकड़ों में प्रदेश में 344 ग्लेशियल झीलें चिह्नित की गई थीं। इनमें 13 झीलों को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। सरकार इन झीलों की स्थिति, आकार और जलस्तर से जुड़े बदलावों के अध्ययन पर काम कर रही है।
झील पर स्थापित उपकरण अलग-अलग परिस्थितियों की जानकारी जुटाएँगे। ऑल-इन-वन मौसम सेंसर हवा की गति और दिशा, वर्षा, सौर विकिरण, वायु तापमान तथा वायुदाब मापेगा। जलस्तर की निगरानी के लिए पानी में सेंसर लगाए गए हैं। कंपन, झुकाव और भू-गतिविधियों को दर्ज करने के लिए एक्सेलेरोमीटर तथा टिल्ट सेंसर स्थापित किए गए हैं। हिमस्खलन से संबंधित गतिविधियों पर नजर रखने के लिए अतिरिक्त उपकरण भी लगाए गए हैं। इनसे झील और उसके आसपास होने वाले बदलावों का रिकॉर्ड तैयार किया जा सकेगा।
बर्फ की गहराई मापने के लिए स्नो डेप्थ सेंसर लगाया गया है। बर्फ की सतह के नीचे अलग-अलग गहराइयों पर तापमान मापने के लिए सात तापमान सेंसर हैं। झील की सतह का तापमान जानने के लिए भी सेंसर स्थापित किया गया है। इन उपकरणों से मिलने वाले आँकड़े जलस्तर, स्थानीय मौसम और बर्फ की स्थिति में बदलाव समझने में मदद करेंगे। वैज्ञानिकों की निगरानी केवल झील के पानी तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आसपास की गतिविधियों की जानकारी भी इसमें शामिल होगी।
उच्च हिमालयी क्षेत्र में सामान्य मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने के कारण प्रणाली में इरिडियम उपग्रह संचार तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। सेंसरों से प्राप्त जानकारी इसके जरिए निगरानी डैशबोर्ड तक पहुँचेगी। सामान्य परिस्थितियों में हर दो घंटे में आँकड़े सीबीआरआई रुड़की और उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को भेजे जाएँगे। आपात स्थिति में उपकरण निर्धारित अंतराल का इंतजार किए बिना तत्काल जानकारी भेज सकेंगे। इसका उद्देश्य असामान्य परिस्थितियों की पहचान में संबंधित तंत्र की सहायता करना है।
उपकरणों को बिजली देने के लिए सौर पैनल और लगभग दस दिन के बैकअप वाली बैटरी की व्यवस्था की गई है। आपदा प्रबंधन सचिव के अनुसार, यह सिस्टम लगभग 61 लाख रुपये में तैयार किया गया है और फिलहाल परीक्षण के चरण में है। निर्धारित मानकों पर सफल रहने पर ऐसी प्रणाली अन्य हिमनद झीलों में भी लगाने की योजना है। अभियान में एसडीआरएफ, एनडीआरएफ और आईटीबीपी ने सहयोग किया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्थापना के पहले चरण की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त की है।
प्रदेश में छह उच्च जोखिम वाली झीलों का बाथीमेट्रिक सर्वेक्षण भी पूरा किया जा चुका है। इनमें वसुंधरा ताल, सरस्वती ताल, केदारताल तथा पिथौरागढ़ की मबांग, प्यूनग्रू और स्युंक्ति यांक्ति झीलें शामिल हैं। सर्वेक्षण से गहराई, जलधारण क्षमता और अन्य जलवैज्ञानिक आँकड़े जुटाए गए हैं। इनका इस्तेमाल जोखिम आकलन और आपदा प्रबंधन की तैयारियों में किया जाएगा। निचले क्षेत्रों की बस्तियों, सड़कों, पुलों और अन्य ढाँचों की सुरक्षा के लिए निगरानी तथा समयबद्ध चेतावनी व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।
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