
Uttarakhand उत्तखण्ड : पहाड़ों से लगातार पलायन के बीच उत्तराखंड का कांडा ताल स्थित टिटोली गांव एक सकारात्मक मिसाल पेश कर रहा है। जहां कई गांव खाली होते जा रहे हैं, वहीं यह गांव अपने पूर्वजों से लेकर अवशेष और अवशेषों के संरक्षण की एक नई कहानी लिख रहा है।
रोजगार और शिक्षा के लिए देश के अलग-अलग शहरों में ग्रामीण हर साल अपने शिक्षक गांव लौट रहे हैं। इसी कड़ी में मंगलवार को टिटोली गांव ने अपना 134वां स्थापना दिवस पूरे उत्साह, श्रद्धा और गौरव के साथ मनाया। यह आयोजन केवल एक अलौकिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि अपनी मिट्टी, संस्कृति और विरासत से लेकर अन्योन्याश्रय का प्रतीक बन गया है।
कार्यक्रम की शुरुआत धार्मिक और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हुई, जिसमें प्रधानमंत्री को तर्पण और विश्वास की दीक्षा दी गई। कुल पुरोहित दीपक पैवेलियन ने पितरों का पुरालेख कर पूजा किया। इसके बाद सुंदर कांड पाठ और सामूहिक प्रार्थना का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में मृतकों ने भाग लिया।
कांडा तहसील के अंतर्गत आने वाले इस गांव में आयोजित होने वाले कार्यक्रम के दौरान माहौल पूर्ण तरह से आध्यात्मिक और सार्वजानिक हो रहा है। पूर्वजों ने गांव, क्षेत्र, राज्य और देश की समृद्धि के लिए सामूहिक रूप से मंगलकामनाएं कीं।
इस अवसर पर गाँव में प्रवासी स्टूडियो की बड़ी भागीदारी देखने को मिली, जो साल भर बाहर रहने के बाद अपने गाँव में रुकी। उन्होंने कहा कि स्थापना दिवस उनके लिए केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि अपनी स्थापना से जुड़ने का अवसर है।
कार्यक्रम में युवाओं से लेकर युवाओं तक सभी की सक्रियता भागीदारी जारी। गांव की पुरानी संस्कृति को याद करते हुए लोगों ने अपना अनुभव साझा किया और आने वाली पीढ़ी को गांव की संस्कृति और अवशेषों से जोड़कर जोर दिया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह के आयोजन के दौर में पहचान बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई जाती है। इसे न केवल सांस्कृतिक विरासत संरक्षित किया जाता है, बल्कि लोगों में अपने गांव की प्रति अपनापन भी बढ़ाया जाता है।
कुल मिलाकर, टिटौली गांव का 134वां स्थापना दिवस यह संदेश देता है कि आधुनिकता और पलायन के बावजूद अपनी परंपराओं से लेकर किसी भी समाज की मूल शक्ति है।





