
Uttarakhand उत्तराखंड: धरती पर रात के समय बढ़ता कृत्रिम प्रकाश अब खगोलीय अध्ययन के लिए एक गंभीर चुनौती बन रहा है। तेजी से फैलते प्रकाश प्रदूषण के कारण रात के आकाश में दिखाई देने वाले तारे और ग्रह-नक्षत्रों का दृश्य लगातार धुंधला होता जा रहा है। शहरी क्षेत्रों में यह स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि अब खगोल विज्ञान से जुड़े शोध और अवलोकन कार्य प्रभावित होने लगे हैं।
आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (ARIES) के वरिष्ठ खगोल वैज्ञानिक डॉ. शशिभूषण पांडे के अनुसार, पहले जो अंधेरी रातों में आकाश की वास्तविक चमक और तारे की रौनक दिखाई देती थी, वह अब धीरे-धीरे कम होती जा रही है। उनका कहना है कि कृत्रिम रोशनी के बढ़ते उपयोग ने प्राकृतिक रात आकाश को प्रभावित किया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, पहले अमावस्या की रातों में आकाशगंगा (दूधिया वे) का दृश्य स्पष्ट रूप से दिखाई देता था, लेकिन अब शहरों और उनके आसपास बढ़ते प्रकाश स्रोत के कारण यह दृश्य लगभग गायब होता जा रहा है।
प्रकाश प्रदूषण के बढ़ने से न केवल आम लोगों के लिए रात का प्राकृतिक सौंदर्य कम हुआ है, बल्कि खगोल निकायों के लिए दूरस्थ अंतरिक्षीय पिंडों का अध्ययन भी कठिन हो गया है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि स्ट्रीट लाइट, बिलबोर्ड, औद्योगिक क्षेत्र और लगातार बढ़ते शहरी विस्तार ने रात के प्राकृतिक अंधकार को काफी हद तक कम कर दिया है। इसके कारण टेलीस्कोप आधारित अनुसंधान केंद्रों पर भी असर पड़ रहा है।
इसी वजह से अब देश और दुनिया के कई प्रमुख वेधशालाओं (ऑब्जर्वेटरीज़) को शहरों से दूर, ऐसे स्थानों पर स्थापित किया जा रहा है जहां प्रकाश प्रदूषण न्यूनतम हो। पहाड़ी और दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित ये वेधशालाएं अब खगोलीय अनुसंधान के लिए अधिक उपयुक्त मानी जा रही हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि कृत्रिम प्रकाश का स्तर इसी तरह बढ़ता रहा, तो आने वाले समय में कई खगोलीय घटनाओं और दूरस्थ ब्रह्मांडीय वस्तुओं को देखना और भी कठिन हो जाएगा। इससे न केवल शोध कार्य प्रभावित होंगे, बल्कि आम लोगों का रात के आकाश से जुड़ना प्राकृतिक अनुभव भी समाप्त हो सकता है।
डॉ. शशिभूषण पाण्डेय के अनुसार, प्रकाश प्रदूषण का प्रभाव केवल विज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण और जैव विविधता पर भी असर डालता है। कई जीव-जंतु जो रात के प्राकृतिक अंधकार पर निर्भर रहते हैं, उनके व्यवहार में भी बदलाव देखा जा रहा है।
खगोल वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि शहरी क्षेत्रों में अनावश्यक रोशनी को नियंत्रित किया जाए और ऊर्जा दक्ष लाइटिंग सिस्टम अपनाया जाए, जिससे प्रकाश का उपयोग जरूरत के अनुसार हो सके।
खगोल वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि समय रहते इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां उन तारों और आकाशगंगाओं को देखने से वंचित रह चाहेंगे, जिन्हें कभी मानव सभ्यता खुले आसमान में आसानी से देख सकती थी।
यदि वैज्ञानिक समुदाय इस समस्या को लेकर जागरूकता बढ़ाने और नीति-निर्माण स्तर पर समाधान की मांग कर रहा है, ताकि रात के आकाश की प्राकृतिक सुंदरता को कायाकल्प किया जा सके।





