उत्तराखंड

कत्यूरों की बैसी से गूंजा उत्तराखंड, उमड़ा आस्था का सैलाब

Kavita2
26 July 2026 12:07 PM IST
कत्यूरों की बैसी से गूंजा उत्तराखंड, उमड़ा आस्था का सैलाब
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हल्द्वानी : उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी ऐतिहासिक द्वारका क्षेत्र में ढाई दशक बाद कत्यूरों की प्राचीन बैसी पूजा परंपरा का आयोजन हुआ। 11 दिनों तक चलने वाली कठिन तपस्या और विशेष देव अनुष्ठान से जुड़ी इस धार्मिक परंपरा ने पहाड़ से लेकर भाबर क्षेत्र तक श्रद्धा और आस्था का माहौल बना दिया है।

विजयपुर धनखल गांव में आयोजित विशेष देव अनुष्ठान में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। इस दौरान देवाधिदेव महादेव के साथ-साथ भूमि देवता और स्थानीय लोक देवी-देवताओं की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। पूजा के बाद देव डांगरों के साथ श्रद्धालुओं का समूह रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट के लिए रवाना हुआ।

कत्यूरों की बैसी उत्तराखंड की प्राचीन धार्मिक परंपराओं में से एक मानी जाती है। इसमें साधक 11 दिनों तक कठिन तपस्या, नियम और धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करते हैं। इस दौरान देव आराधना, जागर और विशेष पूजा के माध्यम से लोक आस्था को जीवंत किया जाता है। लंबे अंतराल के बाद इस परंपरा के आयोजन से क्षेत्र के लोगों में विशेष उत्साह देखा गया।

रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट पर देर शाम कत्यूरी वीरांगना महारानी जिया की जागर आयोजित की गई। जागर उत्तराखंड की प्रसिद्ध लोक धार्मिक परंपरा है, जिसमें देवताओं और ऐतिहासिक पात्रों का आह्वान लोकगीतों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के माध्यम से किया जाता है। महारानी जिया की जागर के दौरान श्रद्धालुओं ने श्रद्धा और भक्ति के साथ हिस्सा लिया।

जागर से पहले गौला नदी, जिसे प्राचीन समय में गार्गी नदी के नाम से भी जाना जाता है, में महास्नान किया गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पवित्र नदी में स्नान कर श्रद्धालु पूजा और अनुष्ठान में शामिल होते हैं। इस दौरान घाट पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी और पूरा क्षेत्र धार्मिक वातावरण से भर गया।

बैसी और जागर के आयोजन को देखने के लिए हल्द्वानी में रहने वाले कत्यूरी परिवार भी बड़ी संख्या में पहुंचे। दूर-दराज क्षेत्रों से आए लोगों ने अपनी प्राचीन परंपराओं से जुड़ने और इस ऐतिहासिक धार्मिक आयोजन का हिस्सा बनने को सौभाग्य बताया।

इस धार्मिक आयोजन में पूर्व केंद्रीय मंत्री और नैनीताल सांसद अजय भट्ट भी पहुंचे। उन्होंने कत्यूरों की प्राचीन परंपरा और लोक संस्कृति की सराहना की। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की पहचान यहां की समृद्ध संस्कृति, लोक परंपराओं और धार्मिक विरासत से जुड़ी हुई है। ऐसी परंपराओं का संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहद जरूरी है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, कत्यूर वंश का उत्तराखंड के इतिहास में विशेष महत्व रहा है। कत्यूरी राजाओं की परंपराएं, देवी-देवताओं की पूजा पद्धतियां और लोक मान्यताएं आज भी पहाड़ी समाज में जीवित हैं। बैसी जैसे धार्मिक अनुष्ठान इन्हीं सांस्कृतिक विरासतों को आगे बढ़ाने का माध्यम हैं।

आयोजकों ने बताया कि इस आयोजन का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ना भी है। आधुनिक दौर में जब लोक परंपराएं धीरे-धीरे सीमित होती जा रही हैं, ऐसे आयोजन समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करते हैं।

बैसी आयोजन के दौरान सुरक्षा और व्यवस्था के लिए भी विशेष इंतजाम किए गए थे। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की मौजूदगी को देखते हुए स्थानीय स्तर पर व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गईं।

ढाई दशक बाद हुए इस आयोजन ने उत्तराखंड की लोक संस्कृति को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। देव पूजा, जागर, महास्नान और पारंपरिक अनुष्ठानों के माध्यम से लोगों ने अपनी आस्था और सांस्कृतिक विरासत का अनुभव किया।

कत्यूरों की बैसी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उत्तराखंड की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। इस आयोजन ने पहाड़ और भाबर क्षेत्र में रहने वाले लोगों को एक साथ जोड़ने का काम किया और क्षेत्र में श्रद्धा व भक्ति का वातावरण बना दिया।

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