
देहरादून : उत्तराखंड की अनंतिम मतदाता सूची ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। चुनाव आयोग द्वारा जारी प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक वर्ष में राज्य में 12 लाख 95 हजार 674 मतदाताओं की कमी दर्ज की गई है। मतदाताओं की संख्या में आई इस बड़ी गिरावट ने सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी है। खास बात यह है कि सबसे अधिक मतदाता देहरादून, ऊधम सिंह नगर (यूएसनगर), हरिद्वार और अल्मोड़ा जिलों में कम हुए हैं। यही चार जिले राज्य की लगभग 50 प्रतिशत विधानसभा सीटों का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए आगामी चुनावों पर इसका सीधा असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मतदाता सूची में इतनी बड़ी कमी सामान्य घटना नहीं मानी जा सकती। ऐसे में सभी दल अब यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से क्यों हटे। अनंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद राजनीतिक दलों ने भी अपने स्तर पर इसकी समीक्षा शुरू कर दी है।
चुनावी दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले देहरादून, हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर और अल्मोड़ा जिलों में मतदाताओं की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। इन जिलों में राज्य की करीब आधी विधानसभा सीटें स्थित हैं और चुनावी नतीजों में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहता है। ऐसे में इन क्षेत्रों में मतदाता संख्या में आई कमी ने चुनावी रणनीति को लेकर नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
चुनाव विशेषज्ञों का कहना है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान कई कारणों से नाम हटाए जाते हैं। इनमें मतदाता की मृत्यु, दूसरे स्थान पर स्थानांतरण, एक से अधिक स्थानों पर नाम दर्ज होना, दस्तावेजों में त्रुटियां या अन्य प्रशासनिक कारण शामिल हो सकते हैं। हालांकि इतनी बड़ी संख्या में नाम कम होने के बाद राजनीतिक दल यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कहीं पात्र मतदाताओं के नाम गलती से सूची से बाहर तो नहीं हो गए।
राज्य के विभिन्न राजनीतिक दल अब अपने कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर पर मतदाता सूची का सत्यापन करने के निर्देश दे रहे हैं। पार्टी संगठन यह जांचने में जुटे हैं कि जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटे हैं, उनमें वास्तविक कारण क्या हैं और यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से हट गया है तो उसे दोबारा जोड़ने के लिए आवश्यक प्रक्रिया समय रहते पूरी की जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव से पहले मतदाता सूची का सही और अद्यतन होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम सूची से बाहर रह जाते हैं तो इसका सीधा प्रभाव मतदान प्रतिशत और चुनाव परिणामों पर पड़ सकता है। इसलिए अनंतिम सूची जारी होने के बाद आपत्तियां और दावे आमंत्रित किए जाते हैं, ताकि अंतिम सूची प्रकाशित होने से पहले सभी त्रुटियों का सुधार किया जा सके।
राजनीतिक दलों की चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि देहरादून, हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर और अल्मोड़ा जैसे जिलों में चुनावी मुकाबले अक्सर बेहद करीबी होते हैं। ऐसे में कुछ हजार मतदाताओं का अंतर भी चुनाव परिणाम बदल सकता है। अब लाखों मतदाताओं के नाम कम होने की खबर ने सभी दलों को बूथ स्तर पर सक्रिय कर दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि मतदाता सूची में कमी का कारण बड़े पैमाने पर पलायन, शहरी क्षेत्रों में स्थानांतरण या जनसंख्या के अन्य बदलाव हैं तो राजनीतिक दलों को अपनी चुनावी रणनीति में भी बदलाव करना पड़ सकता है। वहीं यदि प्रशासनिक कारणों से नाम हटे हैं तो समय रहते उनका सुधार कराना भी आवश्यक होगा।
चुनाव आयोग की प्रक्रिया के अनुसार, अनंतिम मतदाता सूची अंतिम सूची नहीं होती। इसके प्रकाशन के बाद नागरिक अपने नाम जोड़ने, हटाने या संशोधन कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं। निर्धारित अवधि में प्राप्त दावों और आपत्तियों की जांच के बाद अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाती है। ऐसे में अभी भी पात्र मतदाताओं के नाम दोबारा शामिल कराने का अवसर उपलब्ध रहेगा।
राजनीतिक दलों ने अपने कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वे घर-घर जाकर मतदाता सूची का सत्यापन करें और जिन लोगों के नाम सूची में नहीं हैं, उन्हें आवश्यक दस्तावेजों के साथ आवेदन करने के लिए प्रेरित करें। इससे अंतिम मतदाता सूची अधिक सटीक और त्रुटिरहित बनाई जा सकेगी।
चुनावी विशेषज्ञों का मानना है कि मतदाता सूची का अद्यतन होना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए आवश्यक है, लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई भी पात्र मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित न रहे। इसलिए अंतिम सूची प्रकाशित होने से पहले व्यापक स्तर पर सत्यापन और जनजागरूकता अभियान चलाना भी महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल उत्तराखंड में जारी अनंतिम मतदाता सूची ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा शुरू कर दी है। राज्य में एक वर्ष के भीतर 12 लाख 95 हजार 674 मतदाताओं की कमी ने सभी प्रमुख दलों को अपनी चुनावी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। अब सभी की नजर चुनाव आयोग की अंतिम मतदाता सूची पर रहेगी, जिससे यह स्पष्ट होगा कि दावों और आपत्तियों के निस्तारण के बाद मतदाताओं की वास्तविक संख्या क्या रहती है और इसका आगामी चुनावों पर कितना प्रभाव पड़ता है।





