
देहरादून। आगामी उत्तराखंड विधानसभा चुनाव को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी संगठनात्मक तैयारियों को तेज कर दिया है। पार्टी इस बार विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों के चयन को लेकर जमीनी स्तर से मिलने वाले फीडबैक को खास महत्व देने की तैयारी में है। टिकट तय करने की प्रक्रिया में मंडल अध्यक्षों और जिलाध्यक्षों की राय महत्वपूर्ण मानी जाएगी। ऐसे में संगठन और जनता के बीच कमजोर पकड़ रखने वाले मौजूदा विधायकों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं और उनका टिकट कटने की आशंका भी जताई जा रही है।
भाजपा ने मौजूदा विधायकों की चुनावी स्थिति को परखने के लिए तीन प्रमुख पैमाने तय किए हैं। इनमें विधायक की लोकप्रियता और जनाधार, पार्टी कार्यकर्ताओं में विधायक को लेकर नाराजगी या असंतोष तथा संबंधित विधानसभा क्षेत्र की स्थानीय परिस्थितियां और वहां मौजूद मजबूत दावेदारों की स्थिति शामिल है। इन आधारों पर मिलने वाले फीडबैक के बाद पार्टी नेतृत्व टिकट को लेकर अंतिम फैसला कर सकता है।
लोकप्रियता और जनाधार होगा बड़ा आधार
टिकट वितरण में सबसे महत्वपूर्ण पैमाना विधायक की अपने विधानसभा क्षेत्र में लोकप्रियता और जनाधार माना जा रहा है। पार्टी यह जानने का प्रयास करेगी कि पिछले चुनाव के बाद विधायक ने क्षेत्र में अपनी पकड़ कितनी मजबूत की है। जनता के बीच उनकी सक्रियता कैसी रही, स्थानीय समस्याओं के समाधान को लेकर उनका प्रदर्शन कैसा रहा और मतदाताओं के बीच विधायक की मौजूदा स्थिति क्या है, इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखा जा सकता है।
भाजपा की रणनीति ऐसे उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारने की होगी, जिनकी जनता के बीच मजबूत स्वीकार्यता हो और जो पार्टी के पक्ष में अधिक से अधिक मतदाताओं को जोड़ने की क्षमता रखते हों। केवल मौजूदा विधायक होना टिकट की गारंटी नहीं माना जाएगा। जिन क्षेत्रों में मौजूदा विधायक के खिलाफ जनता के बीच नाराजगी ज्यादा होगी, वहां पार्टी दूसरे विकल्पों पर विचार कर सकती है।
कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी पड़ेगी भारी
दूसरा बड़ा पैमाना पार्टी कार्यकर्ताओं की राय और असंतोष से जुड़ा है। भाजपा संगठन आधारित पार्टी मानी जाती है और चुनाव के दौरान बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में अगर किसी विधायक को लेकर स्थानीय कार्यकर्ताओं में नाराजगी है तो यह उनके टिकट की दावेदारी को कमजोर कर सकती है।
पार्टी यह भी देख सकती है कि विधायक का मंडल, जिला और बूथ स्तर के पदाधिकारियों के साथ तालमेल कैसा है। चुनाव जीतने के बाद विधायक संगठन से लगातार जुड़े रहे या नहीं, कार्यकर्ताओं की समस्याओं को कितनी प्राथमिकता दी और स्थानीय संगठन के कार्यक्रमों में उनकी सक्रियता कैसी रही, इन बिंदुओं पर भी फीडबैक लिया जा सकता है।
यही वजह है कि इस बार मंडल अध्यक्षों और जिलाध्यक्षों की राय को टिकट वितरण में प्रमुखता दिए जाने की बात सामने आ रही है। स्थानीय पदाधिकारी सीधे कार्यकर्ताओं और जनता के संपर्क में रहते हैं। ऐसे में उनके फीडबैक के जरिए पार्टी प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र की वास्तविक राजनीतिक स्थिति का आकलन कर सकती है।
स्थानीय समीकरण और मजबूत दावेदार भी अहम
टिकट का तीसरा पैमाना संबंधित विधानसभा क्षेत्र की स्थानीय परिस्थितियां और वहां मौजूद मजबूत दावेदार होंगे। पार्टी यह देखेगी कि किसी सीट पर मौजूदा विधायक के अलावा कौन-कौन से नेता मजबूत स्थिति में हैं और उनकी जनता तथा संगठन में कितनी स्वीकार्यता है। अगर किसी सीट पर मौजूदा विधायक की तुलना में दूसरा दावेदार अधिक मजबूत दिखाई देता है तो टिकट में बदलाव की संभावना बन सकती है।
स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों के साथ सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों का भी टिकट वितरण में महत्व हो सकता है। पार्टी की कोशिश प्रत्येक सीट पर ऐसे प्रत्याशी को उतारने की होगी, जो चुनावी मुकाबले में मजबूत साबित हो और विरोधी दलों के उम्मीदवार को चुनौती देने की क्षमता रखता हो।
कमजोर प्रदर्शन वाले विधायकों पर बढ़ेगा दबाव
भाजपा की इस रणनीति से उन विधायकों पर दबाव बढ़ सकता है, जिनकी क्षेत्र में सक्रियता कम रही है या जिन्हें लेकर कार्यकर्ताओं में असंतोष है। पार्टी चुनाव से पहले जमीनी स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में टिकट वितरण के दौरान प्रदर्शन और जीतने की संभावना को प्राथमिकता मिलने की उम्मीद है।
मंडल और जिला स्तर से मिलने वाले फीडबैक से पार्टी नेतृत्व को यह समझने में मदद मिलेगी कि किस सीट पर मौजूदा विधायक को दोबारा मौका देना फायदेमंद होगा और कहां नए चेहरे को मैदान में उतारने की जरूरत है। इसके चलते टिकट के दावेदार नेताओं की सक्रियता भी आने वाले समय में बढ़ सकती है।
संगठनात्मक गतिविधियां हुईं तेज
आगामी चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने उत्तराखंड में संगठनात्मक गतिविधियों को भी गति देना शुरू कर दिया है। पार्टी का फोकस बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करने पर रहेगा। चुनाव नजदीक आने के साथ विधानसभा क्षेत्रों से मिलने वाले फीडबैक की अहमियत और बढ़ने की संभावना है।
टिकट के तीन पैमानों के जरिए भाजपा एक तरफ मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन का आकलन करेगी तो दूसरी तरफ नए और मजबूत दावेदारों की पहचान भी कर सकेगी। इससे साफ है कि आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट हासिल करने के लिए केवल वरिष्ठता या मौजूदा विधायक होना पर्याप्त नहीं होगा। लोकप्रियता, संगठन के साथ तालमेल और स्थानीय स्तर पर जीतने की क्षमता टिकट की दौड़ में निर्णायक साबित हो सकती है।





