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Uttarakhand उत्तराखंड: पवित्र कार्तिक पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर हरिद्वार की हर की पौड़ी का नज़ारा अलौकिक बन गया। जैसे ही सूर्य अस्त हुआ, गंगा तट पर हजारों दीपों की रौशनी ने आसमान को सुनहरी आभा से भर दिया। श्रद्धा, भक्ति और प्रकाश का संगम देखने हजारों श्रद्धालु देश-विदेश से पहुंचे। इस अवसर पर देव दीपावली का भव्य आयोजन किया गया, जिसने पूरे हरिद्वार को दिव्यता से भर दिया। हर की पौड़ी घाट पर शाम के समय गंगा आरती के साथ ही देव दीपावली का शुभारंभ हुआ। गंगा आरती के दौरान पुजारियों ने वेद मंत्रों के बीच दीप जलाकर गंगा मैया का आह्वान किया। जैसे ही दीप जलने शुरू हुए, पूरा घाट सोने की तरह चमक उठा। श्रद्धालुओं ने गंगा में दीप प्रवाहित किए और मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना की।
हरिद्वार प्रशासन और गंगा सभा की ओर से इस आयोजन को विशेष रूप से सजाया गया था। घाटों को रंग-बिरंगी रोशनी, फूलों और पारंपरिक सजावट से सजाया गया। सुरक्षा की दृष्टि से भी चाक-चौबंद इंतज़ाम किए गए थे। पुलिस, एनडीआरएफ और गोताखोरों की टीमें लगातार घाट पर मौजूद रहीं ताकि कोई भी दुर्घटना न हो। हरिद्वार के जिलाधिकारी ने बताया कि देव दीपावली के लिए करीब एक लाख से अधिक दीप घाटों पर जलाए गए। स्थानीय कलाकारों ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए भक्तों को भक्ति रस में डुबो दिया। वहीं, पर्यटकों ने मोबाइल और कैमरों में इस अलौकिक नज़ारे को कैद किया।
गंगा सभा के अध्यक्ष ने बताया कि देव दीपावली का यह पर्व केवल प्रकाश का नहीं बल्कि आस्था का प्रतीक है। यह वह दिन है जब देवता स्वयं धरती पर उतरकर गंगा स्नान करते हैं। इसी कारण इसे “देवताओं की दीपावली” कहा जाता है। हरिद्वार के मंदिरों में भी विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया गया। माया देवी मंदिर, मनसा देवी मंदिर और चंडी देवी मंदिर में भक्तों की लंबी कतारें लगी रहीं। पूरे शहर में दीपमालाओं से सजे घरों और दुकानों ने यह अहसास कराया कि मानो धरती पर ही स्वर्ग उतर आया हो।
संध्या समय जैसे ही “हर हर गंगे” के जयघोष के साथ आरती समाप्त हुई, आकाश दीपों से जगमगाने लगा। श्रद्धालुओं ने गंगा में दीप प्रवाहित कर पुण्य अर्जित किया। हरिद्वार के संतों और महंतों ने संदेश दिया कि यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पर्यावरण और जल संरक्षण का भी प्रतीक है। हरिद्वार की देव दीपावली ने न केवल श्रद्धालुओं का मन मोह लिया बल्कि इस पर्व ने यह भी दिखाया कि भारतीय संस्कृति की दिव्यता और भक्ति की परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है जितनी सदियों पहले थी।
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