उत्तराखंड

उत्तराखंड के कई क्षेत्र संवेदनशील घोषित

Saba Naaz
23 July 2026 4:17 PM IST
उत्तराखंड के कई क्षेत्र संवेदनशील घोषित
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देहरादून। उत्तराखंड में लगातार बढ़ते भूस्खलन के खतरे को लेकर एक नई रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है। एक वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार राज्य का करीब 18.47 प्रतिशत क्षेत्र भूस्खलन के लिहाज से उच्च और अति उच्च जोखिम वाली श्रेणी में आता है। इस अध्ययन में उत्तरकाशी और चमोली जिलों को सबसे अधिक संवेदनशील पाया गया है। पहाड़ी क्षेत्रों में कमजोर भूगर्भीय संरचना, भारी बारिश, तीखी ढलान और बदलती भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यहां भूस्खलन की आशंका अधिक बनी रहती है।

यह विस्तृत शोध शिव नादर विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा की डिजास्टर मैनेजमेंट लेबोरेटरी के विशेषज्ञों ने किया है। शोधकर्ताओं विपिन चौहान, डॉ. लक्ष्मी गुप्ता और प्रो. जगबंधु दीक्षित के इस अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका जियोएनवायरनमेंटल डिजास्टर्स में प्रकाशित किया गया है। इस अध्ययन में उत्तराखंड के लगभग 53,400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को शामिल किया गया और राज्य के सभी जिलों का विश्लेषण किया गया।

शोध के अनुसार उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी तथा लघु हिमालयी क्षेत्र भूस्खलन के लिए सबसे ज्यादा संवेदनशील पाए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन क्षेत्रों में अधिक वर्षा, पहाड़ों की खड़ी ढलान, कमजोर चट्टानी संरचना, घासभूमि क्षेत्र और जटिल पर्वतीय भू-आकृति भूस्खलन के खतरे को बढ़ाने वाले प्रमुख कारण हैं।

वहीं दूसरी ओर राज्य के तराई-भाबर क्षेत्र जैसे हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जिलों में भूस्खलन का खतरा सबसे कम पाया गया है। मैदानी इलाकों में पहाड़ी ढलान और कमजोर भू-संरचना जैसी परिस्थितियां नहीं होने के कारण यहां इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं की संभावना कम रहती है।

7,182 पुराने भूस्खलनों का किया गया अध्ययन

शोधकर्ताओं ने भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) के आंकड़ों के आधार पर उत्तराखंड में हुए पुराने भूस्खलनों का भी अध्ययन किया। रिपोर्ट तैयार करने के दौरान कुल 7,182 भूस्खलन स्थलों का विश्लेषण किया गया। इनमें 4,276 चट्टानों से जुड़े भूस्खलन, 2,899 मलबे वाले भूस्खलन और सात मिट्टी खिसकने वाले भूस्खलन शामिल थे।

जिलेवार आंकड़ों में उत्तरकाशी में सबसे अधिक 1,165 भूस्खलन स्थल दर्ज किए गए। इसके बाद चमोली में 1,076 और पिथौरागढ़ में 1,048 स्थानों पर भूस्खलन के रिकॉर्ड मिले। टिहरी गढ़वाल में 940, देहरादून में 514, पौड़ी गढ़वाल में 513 और नैनीताल में 494 भूस्खलन स्थल पाए गए।

16 मानकों के आधार पर तैयार किया गया जोखिम मानचित्र

शोधकर्ताओं ने भूस्खलन की संभावना का आकलन करने के लिए 16 प्रमुख मानकों को आधार बनाया। इसमें क्षेत्र की ऊंचाई, ढलान, ढलान की दिशा, मिट्टी का प्रकार, भूगर्भीय संरचना, भूमि उपयोग, वनस्पति, मिट्टी में नमी, बारिश की मात्रा, सड़क और नदी से दूरी तथा भू-भ्रंश जैसी स्थितियों को शामिल किया गया।

इसके अलावा भूस्खलन जोखिम मानचित्र तैयार करने के लिए अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के डिजिटल एलिवेशन मॉडल, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, भारतीय मौसम विभाग, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटिनल-2 उपग्रह डेटा, नासा के मिट्टी नमी आंकड़ों और अन्य अंतरराष्ट्रीय डेटाबेस का उपयोग किया गया।

अध्ययन के अनुसार उत्तराखंड के करीब 21 प्रतिशत क्षेत्र में भूस्खलन का मध्यम जोखिम है, जबकि बाकी क्षेत्र को निम्न और अत्यंत निम्न जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अध्ययन आपदा प्रबंधन, सड़क निर्माण, भवन निर्माण और भविष्य की योजनाओं के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है।

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में हर साल मानसून के दौरान भूस्खलन की घटनाएं सामने आती हैं। ऐसे में वैज्ञानिक अध्ययन से मिले आंकड़ों के आधार पर संवेदनशील क्षेत्रों में पहले से तैयारी करना, निर्माण कार्यों में सावधानी बरतना और आपदा प्रबंधन की बेहतर रणनीति बनाना जरूरी हो गया है।

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