
देहरादून। उत्तराखंड के चकराता की पहाड़ियों में पाया जाने वाला दुर्लभ चकराता टोरेंट फ्रॉग (अमोलोपस चकराताएंसिस) पिछले 41 वर्षों से दिखाई नहीं दिया है। वैज्ञानिकों ने इस प्रजाति के स्थानीय स्तर पर विलुप्त होने की आशंका जताई है। हाल में किए गए एक अध्ययन में कहा गया है कि वर्ष 1985 के बाद से इस दुर्लभ मेंढक का कोई पुख्ता रिकॉर्ड नहीं मिला है।
यह अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका जर्नल ऑफ थ्रेटेंड टैक्सा में प्रकाशित हुआ है। इसमें भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) की वैज्ञानिक कुमुदनी बाला गौतम, एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक देवेंद्र सिंह और अमित बडोला समेत कई शोधकर्ता शामिल रहे।
शोध के अनुसार, चकराता टोरेंट फ्रॉग सामान्य मेंढकों से अलग होता है। यह खेतों, तालाबों या बारिश के पानी वाले स्थानों पर नहीं पाया जाता था, बल्कि केवल पहाड़ी इलाकों में बहने वाली ठंडी, साफ और तेज धाराओं के आसपास ही इसका जीवन संभव था। इसी वजह से इसे टोरेंट फ्रॉग यानी तेज बहाव वाली जलधाराओं का मेंढक कहा जाता है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस प्रजाति की मौजूदगी किसी जलधारा के स्वस्थ और स्वच्छ होने का संकेत मानी जाती है। यह मेंढक पर्यावरणीय बदलावों के प्रति बेहद संवेदनशील होता है और इसके अस्तित्व के लिए साफ पानी और प्राकृतिक आवास बेहद जरूरी हैं।
शोधकर्ताओं ने वर्ष 2023 और 2024 में चकराता क्षेत्र में व्यापक सर्वेक्षण किया। इस दौरान कई जलधाराओं और संभावित आवास स्थलों की जांच की गई। वैज्ञानिकों की टीम ने दिन और रात दोनों समय करीब 39 दिनों तक खोज अभियान चलाया।
सर्वेक्षण के दौरान शोधकर्ताओं ने मेंढक की आवाज सुनने से लेकर चट्टानों, जलधाराओं के किनारों और आसपास के क्षेत्रों की बारीकी से जांच की, लेकिन इस प्रजाति का एक भी सदस्य नहीं मिला। इसके बाद वैज्ञानिकों ने इसके स्थानीय रूप से विलुप्त होने की आशंका जताई।
वैज्ञानिकों का मानना है कि चकराता क्षेत्र में बढ़ता प्रदूषण, सड़कों और भवनों का निर्माण, जंगलों की कटाई और प्राकृतिक जल स्रोतों में बदलाव इस दुर्लभ प्रजाति के लिए सबसे बड़े खतरे बने हैं।
चकराता टोरेंट फ्रॉग केवल स्वच्छ और तेज बहने वाले पानी में ही जीवित रह सकता है। ऐसे में जलधाराओं के स्वरूप में छोटे बदलाव भी इसके अस्तित्व पर गंभीर असर डाल सकते हैं। मानव गतिविधियों के कारण इसके प्राकृतिक आवास लगातार प्रभावित हुए हैं।
शोधकर्ताओं ने चकराता क्षेत्र की जलधाराओं और प्राकृतिक आवासों के संरक्षण के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि अगर समय रहते इन क्षेत्रों को सुरक्षित नहीं किया गया तो पश्चिमी हिमालय की कई अन्य दुर्लभ प्रजातियां भी संकट में आ सकती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी प्रजाति का गायब होना केवल उस जीव के लिए खतरा नहीं होता, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकता है। चकराता टोरेंट फ्रॉग जैसी प्रजातियां पर्यावरण के स्वास्थ्य का संकेत देती हैं, इसलिए इनके संरक्षण पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।
अब वैज्ञानिक इस दुर्लभ मेंढक की खोज और संरक्षण के लिए आगे के प्रयासों पर जोर दे रहे हैं। साथ ही स्थानीय स्तर पर लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने की जरूरत भी बताई जा रही है।





