
देहरादून। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के कथित फर्जी प्रमाण पत्र के जरिए एमबीबीएस में दाखिला दिलाने वाले गिरोह की जांच तेज हो गई है। मामले की तह तक पहुंचने के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) की अलग-अलग टीमों ने दिल्ली, मेरठ और मुजफ्फरनगर में दबिश दी है। जांच के सिलसिले में पुलिस की एक टीम मुजफ्फरनगर निवासी एक छात्रा और उसके पिता को पूछताछ के लिए देहरादून लेकर आई है। छात्रा पर फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेने का आरोप है।
पुलिस और एसआईटी अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि कथित फर्जी प्रमाण पत्र तैयार करने से लेकर मेडिकल कॉलेज में दाखिला कराने तक पूरा नेटवर्क किस तरह काम कर रहा था। जांच एजेंसियों की नजर उन लोगों पर भी है, जिन्होंने दस्तावेज तैयार करने, उनका सत्यापन कराने या दाखिले की प्रक्रिया में कथित तौर पर मदद की।
दिल्ली, मेरठ और मुजफ्फरनगर में दबिश
मामले की जांच का दायरा उत्तराखंड से बाहर भी पहुंच गया है। एसआईटी ने अलग-अलग टीमें बनाकर दिल्ली, मेरठ और मुजफ्फरनगर में संभावित ठिकानों पर दबिश दी। माना जा रहा है कि जांच के दौरान सामने आए दस्तावेजों, मोबाइल नंबरों और अन्य सूचनाओं के आधार पर इन स्थानों पर कार्रवाई की गई।
एसआईटी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे के कथित फर्जी प्रमाण पत्र कहां और किसकी मदद से तैयार किए गए। इसके अलावा प्रमाण पत्र बनवाने के बदले किसी तरह का आर्थिक लेन-देन हुआ या नहीं, इसकी भी जांच की जा रही है।
छात्रा और पिता से पूछताछ
पुलिस की एक टीम मुजफ्फरनगर निवासी छात्रा और उसके पिता को पूछताछ के लिए देहरादून लेकर आई है। आरोप है कि छात्रा ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे से जुड़े फर्जी दस्तावेज का इस्तेमाल कर सरकारी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में प्रवेश लिया था।
पूछताछ में यह जानने की कोशिश की जा रही है कि प्रमाण पत्र उन्हें किसके माध्यम से मिला, इसे तैयार कराने की प्रक्रिया क्या थी और दाखिले के दौरान किन-किन लोगों से संपर्क किया गया था। छात्रा और उसके पिता से मिली जानकारी के आधार पर जांच का दायरा और बढ़ सकता है।
पूरे नेटवर्क की तलाश में एसआईटी
जांच एजेंसी का मुख्य उद्देश्य केवल एक दाखिले की जांच करना नहीं, बल्कि इसके पीछे सक्रिय पूरे कथित नेटवर्क का पता लगाना है। यदि संगठित तरीके से फर्जी दस्तावेज तैयार कर मेडिकल कॉलेजों में दाखिले कराए गए हैं तो इसमें कई लोगों की भूमिका सामने आ सकती है।
एसआईटी इस बात की भी जांच कर रही है कि क्या इसी तरह के प्रमाण पत्र अन्य अभ्यर्थियों को भी उपलब्ध कराए गए। यदि जांच में ऐसे और मामले सामने आते हैं तो संबंधित छात्रों के दस्तावेजों की दोबारा जांच की जा सकती है।
सरकारी कॉलेज में लिया था दाखिला
मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि कथित फर्जी दस्तावेज का इस्तेमाल सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के लिए किया गया। मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की सीटों के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा होती है और विभिन्न आरक्षित श्रेणियों के लिए निर्धारित नियमों के आधार पर सीटें आवंटित की जाती हैं।
ऐसे में यदि कोई अभ्यर्थी फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर आरक्षित कोटे की सीट हासिल करता है तो इससे पात्र अभ्यर्थी के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। यही कारण है कि जांच एजेंसी दस्तावेज तैयार करने से लेकर दाखिला मिलने तक की पूरी प्रक्रिया की जांच कर रही है।
दस्तावेजों की सत्यता की होगी जांच
एसआईटी संबंधित प्रमाण पत्रों की सत्यता की जांच भी करा रही है। यह पता लगाया जाएगा कि दस्तावेज किस कार्यालय या प्राधिकरण के नाम पर तैयार किया गया था और संबंधित रिकॉर्ड में उसका कोई आधार मौजूद है या नहीं।
इसके साथ प्रमाण पत्र पर मौजूद हस्ताक्षर, मुहर और अन्य विवरणों का मिलान भी संबंधित सरकारी रिकॉर्ड से किया जा सकता है। यदि दस्तावेज जाली पाए जाते हैं तो उन्हें तैयार करने और इस्तेमाल करने वाले लोगों की जिम्मेदारी तय की जाएगी।
मोबाइल और बैंक लेन-देन भी जांच के दायरे में
किसी संगठित गिरोह की भूमिका सामने आने की स्थिति में जांच एजेंसी आरोपियों के मोबाइल संपर्क, डिजिटल बातचीत और बैंक लेन-देन जैसे पहलुओं को भी खंगाल सकती है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि अभ्यर्थियों और कथित दलालों या दस्तावेज तैयार करने वालों के बीच किस तरह संपर्क हुआ था।
पुलिस यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही है कि फर्जी प्रमाण पत्र के बदले कितनी रकम ली गई और इस रकम को किन लोगों के बीच बांटा गया। हालांकि आर्थिक लेन-देन से जुड़े तथ्यों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।
और छात्रों के दस्तावेजों पर भी नजर
मामले के सामने आने के बाद अब इसी कोटे से प्रवेश लेने वाले अन्य अभ्यर्थियों के प्रमाण पत्र भी जांच के दायरे में आ सकते हैं। एसआईटी के सामने चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि फर्जी दस्तावेजों के जरिए कोई अन्य अभ्यर्थी भी सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाने में सफल तो नहीं हुआ।
इसके लिए प्रवेश से जुड़े पुराने रिकॉर्ड, काउंसलिंग दस्तावेज और संबंधित प्रमाण पत्रों की जांच महत्वपूर्ण होगी। जरूरत पड़ने पर प्रमाण पत्र जारी करने वाले संबंधित विभागों से भी रिकॉर्ड मांगा जा सकता है।
पूछताछ से खुल सकते हैं कई राज
मुजफ्फरनगर की छात्रा और उसके पिता से हो रही पूछताछ को जांच के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके बयान से यह जानकारी मिल सकती है कि कथित फर्जी प्रमाण पत्र तैयार कराने की शुरुआत कहां से हुई और इसके पीछे कौन लोग सक्रिय थे।
फिलहाल एसआईटी की टीमें दिल्ली, मेरठ और मुजफ्फरनगर में मिले सुरागों को जोड़ने में लगी हैं। जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा कि फर्जी प्रमाण पत्र के जरिए एमबीबीएस में दाखिला कराने वाला नेटवर्क कितना बड़ा था और इसमें किन-किन लोगों की भूमिका थी। पुलिस की कार्रवाई से संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में मामले में और लोगों से पूछताछ या कार्रवाई हो सकती है।





