
देहरादून। मसूरी और आसपास के क्षेत्रों की जलापूर्ति के लिहाज से महत्वपूर्ण कैंपटी क्षेत्र के जलग्रहण क्षेत्रों में भू-कटाव का बड़ा खतरा सामने आया है। इससे इन क्षेत्रों से निकलने वाले सैकड़ों जलस्रोतों के भविष्य पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है। वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआइ), देहरादून के अध्ययन में जलग्रहण क्षेत्रों की संवेदनशीलता को लेकर महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए हैं। अध्ययन 16 जुलाई 2026 को अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका डिस्कवर जियोसाइंस में प्रकाशित हुआ।
कैंपटी क्षेत्र के जलग्रहण क्षेत्र स्थानीय पारिस्थितिकी के साथ-साथ मसूरी और आसपास के इलाकों की जल जरूरतों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इन क्षेत्रों में होने वाली प्राकृतिक प्रक्रियाएं और भू-आकृतिक बदलाव सीधे तौर पर जलस्रोतों की स्थिति को प्रभावित करते हैं। बारिश का पानी पहाड़ी ढलानों से होकर जमीन में पहुंचता है और प्राकृतिक जलधाराओं तथा स्रोतों को पुनर्भरण करता है। ऐसे में जलग्रहण क्षेत्रों में भू-कटाव बढ़ने पर इसका असर पानी के स्रोतों की निरंतरता और उनकी जलधारण क्षमता पर पड़ सकता है।
एफआरआइ के शोधकर्ताओं के अध्ययन ने इस क्षेत्र में भू-कटाव की संवेदनशीलता को लेकर चिंता जताई है। पहाड़ी क्षेत्रों में मिट्टी का कटाव केवल ऊपरी मिट्टी के नुकसान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे ढलानों की स्थिरता, जल के प्रवाह और प्राकृतिक जलस्रोतों के पुनर्भरण की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है। यदि लंबे समय तक ऐसी स्थिति बनी रहती है तो क्षेत्र में मौजूद छोटे-बड़े जलस्रोतों के प्रवाह में कमी आने का खतरा बढ़ सकता है।
मसूरी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए जलग्रहण क्षेत्रों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। पहाड़ी ढलानों पर स्थित प्राकृतिक जलस्रोत स्थानीय आबादी के लिए पानी का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। कई इलाकों में लोग घरेलू जरूरतों के लिए प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर रहते हैं। इसके अलावा पर्यटन गतिविधियों के कारण मसूरी और आसपास के क्षेत्रों में पानी की मांग लगातार बनी रहती है। ऐसे में जलस्रोतों के प्रभावित होने का सीधा असर स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
अध्ययन में सामने आई चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जलस्रोतों का संरक्षण केवल स्रोत के आसपास सफाई या निर्माण रोकने तक सीमित नहीं है। इसके लिए पूरे जलग्रहण क्षेत्र का संरक्षण जरूरी होता है। जिस क्षेत्र में बारिश का पानी एकत्र होकर प्राकृतिक रूप से जमीन और चट्टानों की परतों में जाता है, वही आगे चलकर जलस्रोतों के पुनर्भरण में भूमिका निभाता है। यदि इस क्षेत्र की मिट्टी लगातार कटती रही या प्राकृतिक जल प्रवाह में बदलाव आया तो जलस्रोतों तक पहुंचने वाले पानी की मात्रा प्रभावित हो सकती है।
भू-कटाव के पीछे कई प्राकृतिक और मानवीय कारण हो सकते हैं। पहाड़ी इलाकों में तेज बारिश और ढलानों की प्राकृतिक बनावट मिट्टी के कटाव को बढ़ा सकती है। वहीं सड़क निर्माण, अनियोजित विकास, वन क्षेत्र में बदलाव और ढलानों पर मानवीय गतिविधियां भी जोखिम बढ़ा सकती हैं। जलग्रहण क्षेत्रों में वनस्पति का संरक्षण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पेड़-पौधों की जड़ें मिट्टी को बांधने में मदद करती हैं और बारिश के पानी के बहाव की गति को कम करती हैं।
मसूरी-कैंपटी क्षेत्र में पर्यटन और निर्माण गतिविधियों का विस्तार भी पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील विषय रहा है। पहाड़ी ढलानों पर बढ़ता दबाव प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। यदि वर्षाजल को प्राकृतिक रूप से जमीन में जाने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता और वह तेज गति से ढलान से नीचे बहता है तो मिट्टी के कटाव की संभावना बढ़ जाती है। इससे निचले क्षेत्रों में मलबा और गाद पहुंचने की समस्या भी पैदा हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार जलग्रहण क्षेत्रों के संरक्षण के लिए दीर्घकालिक और वैज्ञानिक योजना की आवश्यकता है। संवेदनशील ढलानों की पहचान, स्थानीय वनस्पति का संरक्षण, वर्षाजल के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखना और आवश्यक स्थानों पर मिट्टी संरक्षण के उपाय अपनाना महत्वपूर्ण हो सकता है। साथ ही ऐसे क्षेत्रों में किसी भी नए निर्माण या विकास परियोजना से पहले उसके पर्यावरणीय प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन किया जाना जरूरी है।
एफआरआइ का अध्ययन नीति-निर्माताओं और स्थानीय प्रशासन के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। जलस्रोतों के संरक्षण को केवल तत्काल जल संकट के संदर्भ में देखने के बजाय उनके पूरे जलग्रहण क्षेत्र की सेहत पर ध्यान देना जरूरी होगा। यदि स्रोतों के उद्गम क्षेत्रों में ही भू-कटाव और पर्यावरणीय क्षरण बढ़ता रहा तो भविष्य में पानी की उपलब्धता पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
मसूरी और आसपास के क्षेत्रों में पहले से ही जल मांग और उपलब्धता के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण है। ऐसे में प्राकृतिक जलस्रोतों की संख्या और उनकी जलधारण क्षमता में कमी स्थानीय जल सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है। इसका असर गर्मियों में और अधिक दिखाई दे सकता है, जब पहाड़ी क्षेत्रों में जलस्रोतों पर निर्भरता बढ़ जाती है।
कैंपटी क्षेत्र के जलग्रहण क्षेत्रों को लेकर सामने आया अध्ययन इसलिए समय रहते चेतावनी के तौर पर देखा जा सकता है। सैकड़ों जलस्रोतों को सुरक्षित रखने के लिए उनके स्रोत क्षेत्रों की निगरानी और संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी। विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों के बीच समन्वय के साथ वैज्ञानिक तरीके से भू-कटाव रोकने के उपाय लागू किए जाएं तो भविष्य में संभावित नुकसान को कम किया जा सकता है।
एफआरआइ का यह अध्ययन ऐसे समय सामने आया है, जब पर्वतीय क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा और बढ़ती मानवीय गतिविधियों के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। कैंपटी के जलग्रहण क्षेत्रों में भू-कटाव का खतरा इस बात की ओर संकेत करता है कि जलस्रोतों को बचाने के लिए केवल पानी के स्रोतों पर नहीं, बल्कि उनके पूरे प्राकृतिक तंत्र पर ध्यान देना होगा। आने वाले समय में इन क्षेत्रों के संरक्षण को लेकर प्रशासन और संबंधित विभागों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।





