उत्तराखंड

Himalaya में बढ़ती गर्मी से बढ़ा खतरा, रात का तापमान बढ़ने से तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर

Kavita2
17 July 2026 9:53 AM IST
Himalaya में बढ़ती गर्मी से बढ़ा खतरा, रात का तापमान बढ़ने से तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर
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हिमालय : आमतौर पर यह माना जाता है कि गर्मी का सबसे अधिक असर मैदानी इलाकों में दिखाई देता है, लेकिन हालिया वैज्ञानिक अध्ययनों और पर्यावरणीय संकेतों ने एक गंभीर चिंता सामने रखी है। एशिया का ‘वाटर टावर’ कहे जाने वाला हिमालय तेजी से गर्म हो रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यहां केवल दिन का तापमान ही नहीं, बल्कि रात का तापमान भी तेजी से बढ़ रहा है। तापमान में इस बदलाव का सीधा असर हिमालयी ग्लेशियरों पर पड़ रहा है, जिनके पिघलने की रफ्तार लगातार बढ़ती जा रही है।

हिमालय पर्वत श्रृंखला एशिया की प्रमुख नदियों का स्रोत है। यहां मौजूद ग्लेशियर गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु और कई अन्य महत्वपूर्ण नदी प्रणालियों को पानी उपलब्ध कराते हैं। इसी कारण हिमालय को ‘एशिया का वाटर टावर’ कहा जाता है। करोड़ों लोगों की जल जरूरतें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हिमालयी जल स्रोतों पर निर्भर हैं। ऐसे में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना भविष्य में जल सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में तापमान वृद्धि की गति वैश्विक औसत से भी अधिक महसूस की जा रही है। ऊंचाई वाले इलाकों में बढ़ती गर्मी ने प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। पहले जहां ठंडे क्षेत्रों में तापमान लंबे समय तक कम रहता था, अब वहां गर्म दिनों और गर्म रातों की संख्या बढ़ रही है।

रात के तापमान में वृद्धि को वैज्ञानिक विशेष रूप से गंभीर मान रहे हैं। सामान्य परिस्थितियों में रात के समय तापमान कम होने से बर्फ और ग्लेशियरों को कुछ हद तक स्थिर रहने का अवसर मिलता है। लेकिन जब रातें भी गर्म होने लगती हैं, तो बर्फ के जमने की प्रक्रिया प्रभावित होती है और पिघलने की गति बढ़ जाती है।

ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं है। शुरुआती चरण में ग्लेशियरों के पिघलने से नदियों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है, जिससे अचानक बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। लेकिन लंबे समय में जब ग्लेशियरों का आकार लगातार घटता जाएगा, तो नदियों में जल प्रवाह कम होने की आशंका भी पैदा हो सकती है।

हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले समुदायों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग कृषि, पशुपालन और प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर हैं। यदि जल स्रोत प्रभावित होते हैं, तो स्थानीय लोगों की आजीविका और जीवन शैली पर गंभीर असर पड़ सकता है।

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे एशियाई महाद्वीप के लिए महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र है। यहां होने वाले बदलावों का असर कई देशों तक पहुंच सकता है। हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में किसी भी बड़े बदलाव से जल संसाधन, जैव विविधता और मौसम के पैटर्न प्रभावित हो सकते हैं।

ग्लेशियरों के पिघलने के पीछे केवल तापमान वृद्धि ही जिम्मेदार नहीं है। वनों की कटाई, प्रदूषण, मानवीय गतिविधियों में वृद्धि और ब्लैक कार्बन जैसे तत्व भी हिमालयी क्षेत्र को प्रभावित कर रहे हैं। ब्लैक कार्बन बर्फ की सतह पर जमकर सूर्य की गर्मी को अधिक अवशोषित करता है, जिससे बर्फ तेजी से पिघलने लगती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं को पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखकर आगे बढ़ाना होगा। सड़क निर्माण, पर्यटन विस्तार और अन्य गतिविधियों के दौरान प्राकृतिक परिस्थितियों की अनदेखी करने से जोखिम और बढ़ सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाना आवश्यक बताया जा रहा है। इसके साथ ही हिमालयी क्षेत्रों में निगरानी प्रणाली को मजबूत करने, ग्लेशियरों पर लगातार अध्ययन करने और स्थानीय समुदायों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए तैयार करने की जरूरत है।

भारत सहित कई हिमालयी देशों के वैज्ञानिक ग्लेशियरों, बर्फबारी और तापमान में हो रहे बदलावों का लगातार अध्ययन कर रहे हैं। उनका उद्देश्य यह समझना है कि आने वाले वर्षों में हिमालयी क्षेत्र किस दिशा में आगे बढ़ सकता है और इसके प्रभावों से निपटने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए।

जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय में हो रहे बदलाव एक चेतावनी की तरह हैं। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो इसका असर केवल पहाड़ी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मैदानी इलाकों में जल उपलब्धता, कृषि और मौसम प्रणाली पर भी पड़ सकता है।

फिलहाल हिमालय में बढ़ती गर्मी और ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और नीति निर्माताओं के लिए बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है। ‘वाटर टावर’ के रूप में पहचाने जाने वाले इस विशाल पर्वतीय क्षेत्र की सुरक्षा आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

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