उत्तराखंड

शादी से इनकार आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं: हाई कोर्ट

Saba Naaz
17 July 2026 9:16 PM IST
शादी से इनकार आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं: हाई कोर्ट
x

उत्तराखंड: हाई कोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल किसी व्यक्ति द्वारा शादी से इनकार कर देना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने की श्रेणी में नहीं आता है। जब तक यह साबित न हो कि आरोपी ने सीधे तौर पर आत्महत्या के लिए उकसाया या इसके लिए कोई दबाव बनाया, तब तक उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती।

नैनीताल स्थित उत्तराखंड हाई कोर्ट की एकलपीठ ने टिहरी के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय (एडीजे) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप तय किया गया था। न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि किसी रिश्ते का खत्म होना या विवाह से इनकार करना दुखद हो सकता है, लेकिन इसे सीधे तौर पर आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता।

यह मामला एक युवती की आत्महत्या से जुड़ा हुआ था। युवती के पिता ने आरोपी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने की शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि टिहरी निवासी शार्दुल नेगी ने उनकी बेटी को परेशान किया, जिसके चलते उसने जनवरी 2021 में नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या कर ली।

मामले के अनुसार, शार्दुल नेगी और युवती के बीच पहले संबंध थे। बाद में शादी को लेकर दोनों के बीच विवाद हुआ और आरोपी ने विवाह करने से इनकार कर दिया। इसके बाद दोनों के रिश्ते खराब हो गए। युवती के पिता की शिकायत पर पुलिस ने आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 306 के तहत मुकदमा दर्ज किया था।

निचली अदालत में सुनवाई के दौरान आरोपी के खिलाफ आरोप तय किए गए थे। इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां आरोपी पक्ष ने तर्क दिया कि केवल शादी से इनकार करने को आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता। आरोपी की ओर से कहा गया कि उसके खिलाफ ऐसा कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, जिससे यह साबित हो कि उसने युवती को आत्महत्या के लिए मजबूर किया।

हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप को साबित करने के लिए मजबूत और स्पष्ट साक्ष्य की आवश्यकता होती है। IPC की धारा 306 के तहत केवल किसी घटना के बाद उत्पन्न परिस्थितियों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए प्रेरित किया या ऐसी स्थिति पैदा की जिससे पीड़ित आत्महत्या करने के लिए मजबूर हुआ।

कोर्ट ने कहा कि किसी रिश्ते में असहमति या विवाह से इनकार जीवन का एक व्यक्तिगत निर्णय हो सकता है। इसे तभी अपराध की श्रेणी में रखा जा सकता है, जब आरोपी की ओर से धमकी, प्रताड़ना या आत्महत्या के लिए सीधा दबाव डालने जैसे तथ्य सामने आएं।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में आरोपी शार्दुल नेगी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को खारिज कर दिया और निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला नहीं बनता है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, हाई कोर्ट का यह फैसला आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े मामलों में साक्ष्य के महत्व को दोहराता है। ऐसे मामलों में केवल परिस्थितियां या भावनात्मक कारण पर्याप्त नहीं होते, बल्कि आरोपी की सीधी भूमिका साबित होना जरूरी होता है।

इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि किसी व्यक्ति द्वारा शादी से मना करना या रिश्ता खत्म करना, अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि आपराधिक मामलों में आरोप तय करने से पहले ठोस सबूतों की जांच जरूरी है, ताकि निर्दोष व्यक्ति को कानूनी कार्रवाई का सामना न करना पड़े।

Next Story