
देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में तीन साल की मासूम बच्ची से दुष्कर्म के मामले में विशेष पॉक्सो अदालत ने सख्त फैसला सुनाया है। अदालत ने बच्ची के रिश्ते के दादा को दोषी ठहराते हुए 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही दोषी पर 40 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है। यह मामला देहरादून के नेहरू कॉलोनी थाना क्षेत्र का है। अदालत ने अपराध की गंभीरता, पीड़िता की बेहद कम उम्र और समाज पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को ध्यान में रखते हुए दोषी को परिवीक्षा का लाभ देने से भी इनकार कर दिया। अदालत का यह फैसला बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की गंभीरता और ऐसे मामलों में न्यायिक जवाबदेही को रेखांकित करता है।
रिश्ते के दादा ने किया था मासूम के साथ अपराध
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मामला देहरादून के नेहरू कॉलोनी थाना क्षेत्र से जुड़ा है। यहां तीन साल की बच्ची के साथ उसके रिश्ते के दादा द्वारा दुष्कर्म किए जाने का मामला सामने आया था।
आरोपी का बच्ची के परिवार से रिश्तेदारी का संबंध था। ऐसे में इस अपराध ने पारिवारिक संबंधों में विश्वास और बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए।
मामला पुलिस तक पहुंचने के बाद कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई। इसके बाद प्रकरण विशेष पॉक्सो अदालत में पहुंचा, जहां सुनवाई के दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर आरोपी को दोषी पाया गया।
इस मामले में घटना की सटीक तारीख, दोषी का नाम और जांच के विस्तृत विवरण की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए पीड़िता की पहचान और उससे संबंधित व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा रही है।
विशेष पॉक्सो कोर्ट ने सुनाया सख्त फैसला
तीन साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध में विशेष पॉक्सो अदालत ने दोषी को 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके अतिरिक्त 40 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।
अदालत ने सजा निर्धारित करते समय अपराध की प्रकृति और उसकी गंभीरता को महत्वपूर्ण माना। बेहद कम उम्र की बच्ची के साथ यौन अपराध को गंभीरता से लेते हुए दोषी के प्रति नरमी बरतने से इनकार किया गया।
बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का प्रावधान किया गया है, ताकि ऐसे मामलों में कानून के अनुरूप न्यायिक कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
परिवीक्षा का लाभ देने से अदालत का इनकार
इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू दोषी को परिवीक्षा का लाभ नहीं देना है। परिवीक्षा का अर्थ कुछ निर्धारित परिस्थितियों में दोषी को जेल भेजने के बजाय कानूनी शर्तों और निगरानी के तहत सुधार का अवसर देना होता है।
हालांकि, ऐसे लाभ का निर्णय अपराध की प्रकृति, संबंधित कानून और अन्य कानूनी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाता है।
उपलब्ध विवरण के अनुसार, देहरादून की विशेष पॉक्सो अदालत ने अपराध की गंभीरता और समाज पर उसके प्रतिकूल प्रभाव को देखते हुए दोषी को परिवीक्षा का लाभ देने से मना कर दिया।
इस प्रकार अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले की परिस्थितियों में दोषी के प्रति नरमी बरतना उचित नहीं होगा।
बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है पॉक्सो कानून
भारत में बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 यानी पॉक्सो कानून लागू है।
यह कानून 18 वर्ष से कम उम्र के सभी बच्चों को यौन उत्पीड़न, यौन हमला और अन्य संबंधित अपराधों से संरक्षण प्रदान करता है।
पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराध की गंभीरता के आधार पर अलग-अलग सजा निर्धारित है। कुछ गंभीर मामलों में लंबी अवधि के कठोर कारावास से लेकर आजीवन कारावास तक का प्रावधान किया गया है।
कानून में पीड़ित बच्चों की पहचान गोपनीय रखने और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उनकी सुरक्षा तथा सम्मान का विशेष ध्यान रखने की व्यवस्था भी है।
रिश्तेदारों से भी बच्चों की सुरक्षा जरूरी
बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में कई बार आरोपी पीड़ित परिवार का परिचित या रिश्तेदार होता है। ऐसी परिस्थितियों में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और किसी भी संदिग्ध व्यवहार को गंभीरता से लेना आवश्यक है।
देहरादून का यह मामला भी पारिवारिक संबंधों के भीतर बच्चों की सुरक्षा के महत्व को सामने लाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अभिभावकों को बच्चों की उम्र के अनुरूप उन्हें सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श के बारे में जानकारी देनी चाहिए। इसके साथ ही बच्चों को ऐसा भरोसेमंद वातावरण उपलब्ध कराना जरूरी है, जहां वे किसी भी असहज अनुभव के बारे में बिना डर अपनी बात कह सकें।
यदि किसी बच्चे के साथ यौन उत्पीड़न की आशंका हो, तो उसकी बात संवेदनशीलता से सुनना और संबंधित अधिकारियों से सहायता प्राप्त करना महत्वपूर्ण है।
पीड़ित बच्चों की पहचान उजागर करना कानूनन अपराध
पॉक्सो कानून के तहत पीड़ित नाबालिग की पहचान सार्वजनिक करने पर प्रतिबंध है। मीडिया और अन्य माध्यमों में ऐसी कोई जानकारी प्रकाशित नहीं की जानी चाहिए, जिससे बच्चे की पहचान उजागर हो सके।
इसमें पीड़ित का नाम, तस्वीर, पता, परिवार से जुड़ी पहचान योग्य जानकारी और अन्य व्यक्तिगत विवरण शामिल हो सकते हैं।
बच्चों से जुड़े अपराधों की रिपोर्टिंग में संवेदनशीलता और गोपनीयता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
दोषी को 20 साल जेल, 40 हजार का अर्थदंड
देहरादून के नेहरू कॉलोनी थाना क्षेत्र से जुड़े इस मामले में विशेष पॉक्सो अदालत ने दोषी को 20 वर्ष के कठोर कारावास और 40 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है।
अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए परिवीक्षा का लाभ देने से भी इनकार किया है। यह फैसला बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों में कानूनी कार्रवाई और पीड़ितों को न्याय दिलाने के महत्व को दर्शाता है।
बच्चों की सुरक्षा केवल परिवार की नहीं, बल्कि समाज और संस्थाओं की भी जिम्मेदारी है। ऐसे अपराधों की समय पर शिकायत, निष्पक्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है।





